किसी आंदोलन को क्या चीज़ सफल बनाती है? लैटिन अमेरिका से लेकर ईरान तक के जनांदोलनों का एक तुलनात्मक विश्लेषण (२०२५–२०२६)
लेखक: रेज़ा आशूरी
सार यह शोध-पत्र इस बात का परीक्षण करता है कि कुछ जन-आंदोलन क्यों सफल होते हैं जबकि अन्य विफल हो जाते हैं; इसके लिए लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और यूरोप के प्रलेखित मामलों की तुलना की गई है। पाँच कारक — संगठनात्मक अवसंरचना, गठबंधन का विस्तार, आर्थिक व्यवधान, रणनीतिक अनुक्रमण और अभिजात वर्ग का दलबदल — निरंतर रूप से टिकाऊ सफलताओं और कुचले गए विद्रोहों के बीच अंतर स्पष्ट करते हैं। इस विश्लेषणात्मक ढाँचे को ईरान के सात विरोध-चक्रों (१९७९–२०२६) पर लागू किया गया है। मुख्य शब्द: नागरिक प्रतिरोध, सामाजिक आंदोलन, संगठनात्मक क्षमता, अभिजात वर्ग का दलबदल यह प्रश्न क्यों महत्वपूर्ण है जब आम जनता सड़कों पर उमड़ पड़ती है, तो दुनिया केवल एक ही सवाल पूछती है: क्या यह आंदोलन सफल होगा? कभी-कभी इसका उत्तर ‘हाँ’ होता है। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का पतन हुआ। बर्लिन की दीवार ढह गई। फ़िलीपींस से मार्कोस भाग खड़ा हुआ। तो कभी-कभी इसका उत्तर ‘नहीं’, या ‘अभी नहीं’ होता है। हॉन्ग कॉन्ग की लोकतंत्र-समर्थक लहर को कुचल दिया गया। मिस्र के तहरीर चौक के ऐतिहासिक क्षण ने और भी कठोर निरंकुशता को जन्म दिया। ईरान के लोगों ने १९७९ के बाद से कम से कम सात प्रमुख विरोध-चक्र आयोजित किए हैं — जिसमें २०२५ के अंत से जारी देश के आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा और घातक विद्रोह भी शामिल है — और इसके बावजूद इस्लामिक गणराज्य सत्ता में…
Civil resistance · elite defection · organizational capacity · social movements