जब राष्ट्र राज्य से दीर्घजीवी हो जाता है: समकालीन ईरान में मृत्यु-राजनीतिक विखंडन और प्रति-राज्यत्व
लेखक: रेज़ा आशूरी
यह लेख ऐतिहासिक रूप से उपेक्षा की शिकार रही एक राजनीतिक परिघटना का सिद्धांत प्रस्तुत करता है: वे परिस्थितियाँ जिनके अंतर्गत नागरिक और प्रवासी आबादी अपनी राष्ट्रीय पहचान को अपने ही राज्य से इस हद तक पृथक कर लेती है कि उसके विरुद्ध बाहरी बल-प्रयोग का स्वागत, देशद्रोह के बजाय, राष्ट्रीय निष्ठा के कार्य के रूप में किया जाने लगता है। 'नेक्रोपॉलिटिकल डिसआर्टिक्यूलेशन' (मृत्यु-राजनीतिक विसंयोजन) की अवधारणा को प्रस्तावित करते हुए, यह अध्ययन म्बेम्बे की 'नेक्रोपॉलिटिक्स' (मृत्यु-राजनीति), पुआर के दुर्बलीकरण सिद्धांत, राज्य-राष्ट्र पृथक्करण ढाँचों और अहमद की 'भावनाओं की सांस्कृतिक राजनीति' को एकसूत्र में पिरोता है, ताकि यह तर्क दिया जा सके कि निरंतर बना रहने वाला नेक्रोपॉलिटिकल शासन उस भावात्मक और प्रतीकात्मक संरचना को उत्तरोत्तर नष्ट कर देता है जो जनता को राज्य से बाँधती है; इसके परिणामस्वरूप देशभक्ति का एक मानकीय विपर्यय उत्पन्न होता है और अंततः ऐसी प्रति-राज्यीयता जन्म लेती है जिसमें राष्ट्रीय राजनीतिक पहचान राज्य के माध्यम से नहीं, बल्कि उसके विरोध में संगठित होती है। यह लेख नेक्रोपॉलिटिक्स की अल-क़ासिमी द्वारा की गई धर्मशास्त्रीय समीक्षा को शामिल करके म्बेम्बे के ढाँचे को और अधिक गहराई प्रदान करता है, और यह सिद्ध करता है कि इस्लामिक गणराज्य का शासन-तर्क ईश्वरीय संदेश द्वारा नहीं, बल्कि…
diaspora nationalism · Iranian politics · necropolitics · state–nation disarticulation