अमर नायक अहमद अशीरी; ख़ूनी आँसू
जान गंवाना अहमद अशीरी 34 वर्ष में ईरान दज़फ़ूल
लेखक: जावेद
९ जनवरी (१९ देई) की सुबह, देज़फ़ूल की हवा में अप्रत्याशित शांति थी। अहमद अपनी नई कार के स्टीयरिंग पर बैठा था और कभी-कभार आईने में पीछे देख लेता था; माँ खामोश थीं और पास ही बैठी उसकी पत्नी, बिना एक लफ़्ज़ बोले, बाहर का मंज़र तक रही थी। मानो वे तीनों ही, अनजाने में, इन चंद घड़ियों को कुछ और लंबा खींच लेना चाहते थे। दोपहर का खाना उन्होंने बाहर खाया। अहमद हमेशा की तरह माहौल को हल्का-फुल्का रखने की कोशिश कर रहा था; वह मज़ाक करता, मुस्कुराता। मगर उन मुस्कुराहटों की तह में कुछ बदल चुका था। पिछली रात से, ठीक उसी लम्हे से जब छर्रे उसके सिर और आँख में आ लगे थे, उसकी निगाहों का अंदाज़ बदल गया था। ८ जनवरी (१८ देई) की रात, अहमद शहज़ादे रज़ा पहलवी के आह्वान पर सड़कों पर उतर आया था; ठीक ईरान के तमाम शहरों के उन आम लोगों की तरह, जो अपनी मांगों को स्वर दे रहे थे और एक-दूसरे तक अपनी आवाज़ पहुँचा रहे थे। वे दो रातें, ८ और ९ जनवरी (१८ और १९ देई), ईरान की सड़कें जन-आंदोलन और व्यापक दमन का मंज़र बन गईं। इस्लामी गणराज्य के सुरक्षाबलों ने निहत्थे लोगों पर गोलियों और छर्रों से हमला बोला और अनगिनत परिवारों को अपने अज़ीज़ों के मातम में डुबो दिया। देज़फ़ूल भी इस हिंसा से महफ़ूज़ न रह सका। उसी रात अहमद भी छर्रों का निशाना बना और उसके सिर व आँख में गहरी चोट आई, मगर अपनी अदम्य वीरता के साथ उसने हौसला नहीं खोया।…
جاویدنام احمد عشیری · دزفول · انقلاب شیروخورشید · جاویدشاه