अमर नायक सैयद मोहम्मद हुसैनी
जान गंवाना सैयद मोहम्मद हुसैनी 24 वर्ष में ईरान रिश्ता यख़साज़ी सड़क
लेखक: रोझ़ावा
शब्दों ने जैसे कोई महफ़िल सजा रखी है; कोई शहनाई फूंक रहा है तो कोई ढोल पीट रहा है, वहीं दूसरी ओर झांझ और दमाम की थाप दिल को दहला रही है। किलकारियां गूंज रही हैं, सुर छेड़े जा रहे हैं और कुछ लोग इस सबके बीच मदमस्त होकर झूम रहे हैं। मैं मोहम्मद को कभी उसके जन्मदिन के केक के साथ देखता हूँ, तो कभी एक प्यारी-सी बच्ची का हाथ थामे हुए। एक गर्दिश, फिर एक गर्दिश... और इस चक्कर के ख़ात्मे पर 'देय' का महीना नमूदार होता है; उस स्याह लिबास में जिसका दामन ख़ून से लथपथ है। ख़ुशियाँ औंधे मुंह गिर पड़ती हैं, ख़ून की लहरें सुनामी की मानिंद ईरान की धरती पर टूट पड़ती हैं और मोहम्मद ख़ाक पर गिर पड़ता है। वह बच्ची चीख़ती है, मातम मनाती है और बाल बिखेरे दर-ब-दर भटकते हुए अपने जांबाज हमदम को तलाशती है। सैयद मोहम्मद हुसैनी, २४ साल का गबरू गीलक नौजवान, ख़ूबसूरत शहर रश्त का बाशिंदा था। ऊर्जा और ज़िंदगी की उमंग से लबरेज़, वह उम्मीद और मोहब्बत के साथ अपना मुस्तक़बिल संवार रहा था। दोस्तों के बीच वह बेहद चहेता था और लोग उसे उसकी दिलेरी और दरियादिली के लिए जानते थे। उसके दिल में एक तड़प थी, मगर सिर्फ़ अपने लिए नहीं; वह पूरे ईरान और हर ईरानी के लिए अमन, ख़ुशहाली और आज़ादी का ख़्वाहिशमंद था। मोहम्मद सबका सहारा था; वह प्यार लुटाता था और प्यार पाता था। देय महीने की शुरुआत ईरान में अशांति की एक नई लहर का आग़ाज़ थी। बद…
رشت · گیلان · جاویدنام سیدمحمد حسینی