अमर नायक सालार मेहरी; अगर मैं मर जाऊं, तो मेरा नाम भूलने मत देना

जान गंवाना सालार मेहरी 29 वर्ष में ईरान तेहरान नसीमशहर

लेखक: जावेद

«ख़ुदा की क़सम, सब कुछ पैसा ही नहीं होता कि बस लोगों की जेबें खाली करने पर तुले रहो। थोड़ी इंसानियत, थोड़ा लिहाज़ भी रखो। आओ एक-दूसरे का ख़्याल रखें, एक-दूसरे पर रहम करें, एक-दूसरे की जेब का भी ध्यान रखें।» यह सब सालार मेहरी ने लिखा था; एक ऐसा नौजवान जिसके दिन रंग, थिनर की गंध, पॉलिशिंग मशीनों और गाड़ियों की बॉडी के बीच गुज़रते थे। लोग उसे ज़्यादातर 'सालार जापानी' के नाम से जानते थे; एक ऐसा कार-पेंटर जिसकी अपनी एक साख थी, अपने ग्राहक थे, मगर वह यह नहीं चाहता था कि जो हुनर उसने सीखा है, वह सिर्फ़ उसी की पूँजी बनकर रह जाए। वह शागिर्दों को सिखाता था, डेंटिंग, पेंटिंग, स्क्रैच-रिपेयर, पॉलिश, सेरामिक और कार पेंट इंस्पेक्शन के पेशेवर कोर्स आयोजित करता था, और कभी-कभी तो बिना किसी स्वार्थ के, वही हुनर जिसे सीखने में उसने सालों पसीना बहाया था, दूसरों को मुफ़्त में सिखा देता था। सालार यज़्‍द का रहने वाला था और तेहरान के नसीम-शहर में रहता था। उसकी उम्र २९ साल थी, लेकिन उसके जो लेख पीछे छूट गए हैं, उनसे साफ़ झलकता है कि वह सही ढंग से जीने और दूसरों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को लेकर कितना संजीदा था। एक जगह उसने ग़ज़ब की सच्चाई के साथ लिखा था: «मेरी कुछ बुरी आदतें हैं कि मैं अपनी, अपने जिस्म और अपनी रूह की इज़्ज़त नहीं करता। ऐ ख़ुदा, मैं शर्मिंदा हूँ। कोशिश करूँगा कि तूने जो नेमत मुझे बख़्शी है,…

سالار مهری · تهران · نسیم‌شهر

यहाँ पूरा पाठ पढ़ें

Narrata

Documented Truth by Independent Voices

A multilingual platform preserving personal narratives, eyewitness accounts, and untold stories.