अमर नायक ओमीद फ़ल्लाहपूर; ओमीद, उम्मीद का मसीहा बन गया
जान गंवाना ओमीद फ़ल्लाहपूर 40 वर्ष में ईरान करज गुलशहर
लेखक: परिया
घोर अँधेरी रात, मौजों का ख़ौफ़ और ऐसा रूह-कँपाने वाला भँवर, साहिलों पर खड़े बेफ़िक्र लोग हमारे दिल का हाल क्या जानें! रात की अंधाधुंध गोलियों की गूँज अब भी शहर के कानों में बज रही थी। ९ जनवरी (१९ दे माह) की सुबह आ पहुँची; सूरज निकल चुका था, आसमान रोशन हो गया था और दुनिया, रात के अँधेरे में इस शहर पर क्या बीती इससे पूरी तरह बेपरवाह, अपनी रोज़मर्रा की रफ़्तार पर चल पड़ी थी; लेकिन करज में, रात अभी ख़त्म नहीं हुई थी। बारूद और धुएँ की बू अब भी शहर की हवा में भारी होकर तैर रही थी, और भोर तक गलियों-सड़कों पर जो दहशत छाई रही, उसके साए तले वे बिल्कुल बदली हुई लग रही थीं। रात भर गलियों में गूँजती गोलियों की तड़तड़ाहट मानो अभी घरों की दीवारों से मिटी नहीं थी; जैसे शहर पिछली रात के उस ख़ून-आलूदा ख़्वाब को सुबह की बेदारी में भी अपने काँधों पर ढो रहा हो। सुबह तो आ गई थी, मगर यह रोज़ जैसी सुबह हरगिज़ न थी। खिड़कियों की ओट से रतजगे की मारी आँखें सड़कों पर टिकी थीं; वे माताएँ जो रात भर गोलियों की आवाज़ पर कान लगाए रहीं, वे पिता जो हर अनजानी आहट से सहम उठते थे, और वे घर जिन्होंने अपने अज़ीज़ों को खो देने के ख़ौफ़ में रात काटी थी। फ़ोन बंद थे, इंटरनेट ठप था और राब्ते के सारे रास्ते बंद थे; बहुतों को तो यह तक नहीं पता था कि महज़ दो गलियाँ छोड़कर लोगों पर क्या क़यामत टूट पड़ी है। करज एक भारी ख़ामोशी मे…
امید فلاحپور · نراتا · گلشهرکرج · ۱۹دی