अमर नायक हसन क़ासिमी; खाली हाथ
जान गंवाना हसन क़ासमी 30 वर्ष में ईरान इस्फ़हान ज़ैनबियेह, इस्फ़हान
लेखक: साये
हर बार जब वह अपनी कमर पर पेटी कसते, तो उनके सीने में एक प्राचीन उक्ति गूँज उठती: कराटे यानी «खाली हाथ»। उस्ताद ने अपने शागिर्दों को सिखाया था कि एक सच्चा इंसान अपनी ताक़त किसी हथियार या ख़ौफ़ के साजो-सामान से नहीं, बल्कि अपनी तराशी हुई रूह और पुरसुकून ज़ेहन से हासिल करता है। बरसों तक इस्फ़हान के खेल परिसरों में, उनकी रूह की गहराइयों से उठने वाली वह बुलंद पुकार, वह अडिग «किआई», थकान को चकनाचूर करने और नामुमकिन पर फ़तह पाने के लिए गूँजती रही। वह केवल एक प्रशिक्षक ही नहीं, बल्कि अखाड़े के एक बाअदब और न्यायप्रिय निर्णायक थे, जिन्होंने इंसाफ़ के तराज़ू का सौदा कभी किसी चीज़ से नहीं किया। हसन क़ासिमी ३१ वर्ष के थे, जिनका जन्म १४ नवंबर १९९४ (२३ आबान १३७३) को इस्फ़हान प्रांत के हबीबाबाद-ए-बोरख़्वार की पावन मिट्टी में हुआ था। उनकी पूरी जवानी, उपलब्धियाँ और कोचिंग का जुनून इसी सरज़मीं पर परवान चढ़ा। इस उसूल-पसंद सफ़र में, उनकी पत्नी फ़ातिमा रज़ाई भी कंधे से कंधा मिलाकर कराटे प्रशिक्षिका थीं, ताकि दोनों मिलकर नौजवानों की एक ऐसी नस्ल संवार सकें जो फ़न की बारीकियों के साथ-साथ इंसानी अख़लाक़ से भी वाक़िफ़ हो। उनके ख़्वाब बड़े मगर एकदम साफ़ थे: अपने शागिर्दों को दुनिया के सबसे ऊँचे पोडियम पर देखना, ख़ुद रेफ़री के आला मुक़ाम तक पहुँचना, और घर के आँगन में, वह अपने तीन साल के बेटे, आराद, को बढ़ते और…
حسن قاسمی · اصفهان · داور کاراته