अमर नायक मेहदी ज़बीही; हमारे बच्चों के ख़ून पर मत फिसलो

जान गंवाना मेहदी ज़बीही 25 वर्ष में ईरान सावेह शरियाती मार्ग

लेखक: आवीन

«११ फ़रवरी (२२ बहमन) की रैली के लिए मुनासिब जूते पहन कर आना, ताकि हमारे बच्चों के ख़ून पर पाँव फिसल न जाएँ।» मेहदी ज़बीही को खोने के गहरे दर्द की सबसे अमिट दास्तान वही अल्फ़ाज़ थे, जो उनके अपनों ने ११ फ़रवरी (२२ बहमन) के जुलूस के दिन कहे थे। उन दिनों, जब हुकूमत लोगों को सड़कों पर रैली के लिए बुला रही थी, उन्होंने एक मुख़्तसर से जुमले में हज़ारों ग़मज़दा माओं के सीने के दर्द को आवाज़ दे दी। दिन-रात का हिसाब काटना दूभर हो रहा था। लोग दर्द और रंजो-ग़म से जूझ रहे थे। मगर मेहदी ज़बीही के ज़ेहन में एक अलग ही हिसाब चल रहा था; सावेह का रहने वाला पच्चीस (२५) साल का यह नौजवान, जिसके पास अकाउंटेंसी (लेखांकन) में मास्टर्स की डिग्री थी, लेकिन इन सबसे बढ़कर, उसका दिल एक ऐसे मुस्तक़बिल के ख़्वाब देख रहा था जहाँ इंसानी जान की क़ीमत किसी भी गिनती या आंकड़े से कहीं ज़्यादा हो। मासूमा और हुसैन के बेटे मेहदी की पैदाइश १६ नवंबर २००० (२६ आबान १३७९) को हुई थी। वह उसी युवा पीढ़ी से ताल्लुक रखते थे, जो अपने वतन का भविष्य उसे संवारने में तलाश रही थी। उनके परिजन और दोस्त उन्हें एक शांत, ज़िम्मेदार और उम्मीदों से भरे नौजवान के रूप में याद करते हैं; एक ऐसा शख़्स, जिसकी ज़िंदगी के अभी कई अध्याय लिखे जाने बाक़ी थे। ८ जनवरी (१८ देय) को सावेह की शरियाती सड़क उनकी ज़िंदगी का आख़िरी पड़ाव बन गई। असली गोलियों ने उनके…

مهدی ذبیحی · ساوه · دانشجوی دکترا

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