अमर नायक मोहम्मद रोस्तमी; धराशायी हुआ एक सरफ़राज़ सरो

जान गंवाना मोहम्मद रोस्तमी 42 वर्ष में ईरान तेहरान फ़रमानदारी क़िला हसन ख़ान

लेखक: नूरा

८ जनवरी २०२६ (१८ दे १४०४) की रात, ईरान का दुनिया से संपर्क धीरे-धीरे टूटकर ख़ामोश हो गया। इंटरनेट पहले धीमा और अस्थिर हुआ, और फिर संचार के सारे रास्ते एक-एक करके बंद होते चले गए। उस रात के बाद, जो भी वीडियो उस घेराबंदी को पार कर बाहर आ सका, वह अपने साथ ईरान की सड़कों पर बीती दास्तान का एक टुकड़ा समेटे हुए था। उन्हीं में से एक वीडियो क़लअ-ए-हसन ख़ान से सामने आया। फ़रमानदारी के सामने से गुज़रती एक कार के भीतर से कैमरे ने सड़क का मंज़र क़ैद किया था। वह महज़ कुछ सेकंड का वीडियो था; मगर वे चंद सेकंड एक ऐसा मंज़र छोड़ जाने के लिए काफ़ी थे जिसे भुलाना आसान न था। दो नौजवान ज़मीन पर बेसुध पड़े थे; एक काले कपड़ों में और दूसरा लाल लिबास में। वह वीडियो हाथों-हाथ फैल गया, एक फ़ोन से दूसरे फ़ोन में पहुँचा और लोग उसे बार-बार देखकर आँसू बहाते रहे, बिना यह जाने कि वे दोनों आख़िर कौन थे। शायद उस लम्हे उनका नाम भी मायने नहीं रखता था; बस इतना ही कि दो हमवतन ज़मीन पर गिरे पड़े थे और कोई उनके अज़ीज़ जिस्म को सड़क से उठाकर महफ़ूज़ जगह पहुँचाने तक के क़ाबिल न था, दिल को छलनी करने के लिए काफ़ी था। उन दोनों के पीछे यक़ीनन एक घर था, एक परिवार था और कुछ ऐसे लोग थे जिनकी आँखें उसी पहर दरवाज़े पर टिकी थीं और जिन्हें ख़बर तक न थी कि उनका अपना किस हाल में कहाँ पड़ा है। वीडियो के वे चंद सेकंड पूरे तीन घंटे की उस दर…

محمد رستمی · قلعه حسن خان · تهران · پیکر رها شده

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