अमर नायक नेदा मोहम्मदी; विजय के कैनवास पर आज़ादी का चित्र
जान गंवाना नेदा मोहम्मदी 24 वर्ष में ईरान तेहरान पीरूज़ी मार्ग
लेखक: रूदाबेह
९ जनवरी (१९ देय) की रात, पीरूज़ी मार्ग। लोग घरों से बाहर निकल आए थे; औरत और मर्द, बूढ़े और जवान, यहाँ तक कि बच्चे भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे और उनकी आवाज़ें सड़क पर गूँज रही थीं। एक ऐसी आवाज़ जो ख़ौफ़ की सरहदों को पार कर चुकी थी और इमारतों के बीच बुलंद हो रही थी; आज़ादी की ख़ातिर गूँजती चीख़ें, ज़िंदगी के लिए, और उस भविष्य के लिए जिसका फ़ैसला वे ख़ुद अपने हाथों से करना चाहते थे। चौबीस साल की नेदा मोहम्मदी उस रात सड़क पर उतरी थी; ज़िंदगी के कैनवास पर आज़ादी का अक्स उकेरने के लिए। वह तन्हा नहीं थी; उमड़ते हुए जनसैलाब के साथ सड़क पर आई थी; एक ऐसा हुजूम जो खौल रहा था और अपने क़दमों व नारों से सड़क को थर्रा रहा था। शायद उनमें से कोई नहीं जानता था कि चंद मिनटों बाद यही सड़क उनकी आख़िरी साझी तस्वीर को अपने सीने में समेटने वाली थी। झड़प तेज़ होते ही गोलियाँ चलने लगीं। पहली गोली नेदा के पैर में आ लगी। सीसे की गोली ने खाल और गोश्त को चीर दिया और टीस उसकी हड्डियों के गूदे तक उतर गई; मगर नेदा ज़मीन पर नहीं गिरी। वह बैठी नहीं। उसने सिर से अपना शॉल उतारा और उसी कपड़े से अपने ज़ख़्म को बाँध लिया। अभी उसका काम अधूरा था; उसके भीतर कुछ ऐसा था जो उसे ज़मीन पर पड़े रहने की इजाज़त नहीं दे रहा था। वहाँ अभी भी ऐसे लोग थे जो घायल हो चुके थे और जिन्हें मदद की दरकार थी। वह दोबारा उठ खड़ी हुई; फिर से भीड…
ندا محمدی · تهران · خیابان پیروزی