अमर नायक मोहम्मद सफ़री फ़शकी; वह आधा घंटा जो कभी ख़त्म नहीं हुआ
जान गंवाना मोहम्मद सफ़री फ़शकी 18 वर्ष में ईरान करज पाकदाश्त
लेखक: नारीना
८ जनवरी (१८ देई) की रात, फ़ोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ़ से मोहम्मद की आवाज़ आई, हमेशा की तरह शांत और साफ़: «मम्मी, आज मेरा काम जल्दी ख़त्म हो गया। बस आधे घंटे में घर पहुँच रहा हूँ।» और फिर फ़ोन कट गया। वही आधा घंटा, वही चंद अलफ़ाज़, आख़िरी चीज़ थे जो उसके परिवार ने उससे सुने। मोहम्मद सबसे बड़ा बेटा था। अठारह साल का, इंडस्ट्रियल इलेक्ट्रिकल के आख़िरी साल का छात्र। छह महीने से वह काम कर रहा था; किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि अपने शौक़ से। वह पैसे जोड़ रहा था ताकि अपनी मनपसंद कार ख़रीद सके। उसे गाड़ियों का जुनून था, इंजन की आवाज़, रेस ट्रैक और रफ़्तार से बेपनाह प्यार था। तकनीकी कामों में उसमें ग़ज़ब की क़ाबलियत थी। ज़रा-सी तालीम से ही वह हर हुनर पलक झपकते सीख लेता; फिर चाहे इंजन की मरम्मत हो या इमारतों की वायरिंग। पड़ोसी और दोस्त कहा करते थे कि अगर कोई चीज़ ख़राब हो जाए, तो बस मोहम्मद को आवाज़ दे दो। वह बिना किसी स्वार्थ के, चेहरे पर वही चिरपरिचित मुस्कान और सधे हुए हाथों के साथ हमेशा दौड़ा चला आता। बेहद दयालु था। हँसमुख। ज़िम्मेदार; सिर्फ़ अपने परिवार के प्रति ही नहीं, बल्कि अपने आस-पास के हर इंसान के लिए। अगर किसी को मदद की ज़रूरत होती, तो बिना चूँ-चपड़ किए काम कर देता और फिर ऐसे निकल जाता जैसे कोई ख़ास काम किया ही न हो। उस रात पाकदाश्त में, एक गोली उसके सीने के दाईं तरफ़ आ लगी। लोग उसे…
محمد صفری فشکی · پاکدشت · دانشآموز