अमर नायक आइदा बरासा; सच्चाई तक चौदह दिन
जान गंवाना आइदा बरासा 20 वर्ष में ईरान तेहरान तेहरानपार्स
लेखक: साये
देह के महीने की चुभन बेरहम थी और तेहरान की हवा सर्द और जानलेवा; ऐसी ठंड जो हड्डियों के गूदे तक उतर जाती थी। कुछ दिन पहले से ही, ख़ासकर ८ और ९ जनवरी (१८ और १९ देह-माह) तक आते-आते, प्रदर्शनकारियों की आवाज़ों और उनकी मौजूदगी से सड़कों का नक़्शा ही बदल चुका था। तेहरानपार्स में लोगों की आँखों में एक अजीब और उसी वक़्त उम्मीद से भरी चमक तैर रही थी; उम्मीद और बदलाव का ऐसा एहसास, मानो इस बार डर की दीवार में दरार पड़ चुकी हो। ९ जनवरी (१९ देह-माह) का दिन था जब आइदा ने सड़कों पर क़दम रखा; घुंघराले बालों और गहरी, भेदती आँखों वाली २० साल की एक युवती, जो मनोविज्ञान की छात्रा थी। वह मेहनती, दृढ़निश्चयी, दयालु और हँसमुख थी, जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ एक डबिंग कलाकार के रूप में भी सक्रिय थी और अपनी आवाज़ से मुख़्तलिफ़ किरदारों में जान फूँक दिया करती थी। आइदा का गहरा यक़ीन था कि किसी कुचली हुई कौम की रूह का इलाज क्लीनिकों की मेज़ों के पीछे लिखे नुस्खों से मुमकिन नहीं है; क्योंकि लोगों के ज़ेहन की असली गिरहें सड़कों की आज़ादी पर लगी पाबंदियों और घुटन व नाउम्मीदी के संकरे मुहाने पर ही बनती हैं। आइदा महज़ तमाशा देखने या यूँ ही इत्तेफ़ाक़ से सड़क पर नहीं उतरी थी। उसे महसूस हो रहा था कि लोग, उसकी अपनी पीढ़ी और विश्वविद्यालय के वे नौजवान जो इंसानी ज़ेहन और उसके व्यवहार को समझने की तालीम ले रहे थे, इस घुटन के…
آیدا برآسا · تهرانپارس · دانشجو