अमर नायक मजीद नेकअंदेश; वतन का निष्ठावान सिपाही

फांसी मजीद नीकअंदीश 25 वर्ष में ईरान मशहद वकील आबाद

लेखक: साये

३० सितंबर (८ मेहर) की भोर में, मशहद की वकील-आबाद जेल की ऊँची और सर्द दीवारों पर मटमैली रोशनी की एक बारीक लकीर रेंग गई। उस भारी और चुभते सन्नाटे में सेकंड ठहर-ठहर कर सरक रहे थे। अंधेरे गलियारों में से एक के छोर पर, एक नौजवान थके मगर अडिग कदमों से अपनी मुकद्दर की ओर बढ़ रहा था। वह मजीद नेक-अंदेश था; क़ूचान की मिट्टी का एक बेटा, जिसकी तक़दीर पिछले साल की सर्दियों के उन उथल-पुथल भरे दिनों में मशहद की गलियों और तबरसी इलाक़े के विरोध-प्रदर्शनों के नारों से जुड़ गई थी, और अब वह पौ फटने की दहलीज़ पर, अपनी ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव को सामने देख रहा था। सब कुछ जनवरी (दई माह) में शुरू हुआ था; जब बेलगाम महंगाई, आजीविका के बिखरने और गहरे सामाजिक व राजनीतिक अवरोध के चलते देश भर में विरोध-प्रदर्शनों की लहर फैल गई थी। २८ दिसंबर (७ दई) को उठी शुरुआती चिंगारियों के बाद, शहज़ादा रज़ा पहलवी द्वारा ८ और ९ जनवरी (१८ और १९ दई) के लिए दिए गए देशव्यापी आह्वानाें ने जनता के संचित आक्रोश को सड़कों पर ला खड़ा किया। मजीद, २५ साल का एक नौजवान और गाड़ियों की डेंटिंग-पेंटिंग का कारीगर, जो अपनी ही पीढ़ी के लाखों युवाओं की तरह छोटी-बड़ी उम्मीदों की गठरी अपने कंधों पर उठाए हुए था और कमरतोड़ आर्थिक दबावों तले पिस चुका था, उस समय मशहद में अपनी अनिवार्य सैन्य सेवा के दिन काट रहा था। वह इन आह्वानाें के जवाब में और आज़ादी,…

مشهد · سرباز · مجید نیک‌اندیش · اعدام

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