अमर नायक बेन्यामिन अलीज़ादेह

जान गंवाना बेन्यामीन अलीज़ादे 15 वर्ष में ईरान रिश्ता

लेखक: जावेद

बन्यामीन अलीज़ादे १५ वर्ष का था; एक शांत, कम-बोलने वाला, दयालु और शिष्ट छात्र, जो शायद अपने दिल में चलने वाली बातों से बहुत कम बोलता था, मगर उसके शांत स्वभाव को डर समझने की भूल नहीं की जा सकती थी। उसमें अपना एक अनूठा साहस था; उन किशोरों जैसा, जो शायद भीड़ में ज़्यादा न बोलते हों, लेकिन जब बात उनके विश्वास और उसूलों की आती है, तो वे कभी पीछे नहीं हटते। बन्यामीन को जानवरों से गहरा लगाव था और वह फ़ुटबॉल का शौक़ीन था। वर्ष २०२४ (१४०३) में उसके पैर में चोट लग गई और लिगामेंट फट गया। डॉक्टर ने उसे खेलने-कूदने से मना कर दिया और फ़ुटबॉल, कम से कम कुछ समय के लिए, उसकी ज़िंदगी से दूर हो गया। इसके बावजूद, उसके ख़्वाब महज़ फ़ुटबॉल के मैदान तक ही सीमित नहीं थे। उसे गाड़ी और मोटरसाइकिल चलाने का शौक़ था और वह चाहता था कि किसी दिन उसके पास एक प्यूजो पर्शिया कार हो और वह एक बाइक ख़रीदे; १५ वर्ष के एक लड़के के लिए ये सीधी-सादी और जानी-पहचानी हसरतें थीं, जिसे अभी बड़े होने का तजुर्बा हासिल करने की मोहलत तक नहीं मिल पाई थी। ९ जनवरी २०२६ (१९ दे माह १४०४) को, बन्यामीन रश्त की बाहोनर सड़क पर गया। निकलने से पहले उसने अपने इंस्टाग्राम पेज पर लिखा था: «डरते हो तो मत करो, कर दिया तो डरो मत»। यह जुमला उन बातों में से था जो इंसान कभी किसी बड़े वाक़ये का सामना करने से पहले अपने लिए लिख छोड़ता है; यह जाने बिना कि…

بنیامین علیزاده · رشت · جاویدنامان کودک · سنگر

यहाँ पूरा पाठ पढ़ें

Narrata

Documented Truth by Independent Voices

A multilingual platform preserving personal narratives, eyewitness accounts, and untold stories.