अमर नायक मरियम इब्राहिमी; एक गोली, दो जानें
जान गंवाना मरियम इब्राहिमी 41 वर्ष में ईरान زاینده رود बीस्तजान
लेखक: सरवा
एक माँ, जिसे अपने बच्चे की बेचैनी गली के घने अंधेरे में खींच लाई थी, उसने कभी गुमान भी न किया था कि अपने जिगर के टुकड़े को ढूँढने के लिए उठाए जा रहे उसके क़दम उस गोली पर जाकर ख़त्म होंगे, जो बस चंद क़दम दूर उसी की घात में थी। वह बेरहम गोली, जिसने एक ही पल में न सिर्फ़ उसकी ममता भरी चिंताओं का अंत कर दिया, बल्कि उसके मातृत्व के पूरे हसीन संसार को सदा के लिए बुझा दिया। मगर दर्द का आलम यहीं ख़त्म नहीं हुआ; वही फ़ौजी गोली उसके सीने और दिल को चीरती हुई सीधे उसके पिता के दिल में जा धंसी, जो क़दम-ब-क़दम उसके पीछे चले आ रहे थे—ताकि एक ही पल में एक पूरे परिवार का सारा प्यार और उनका पूरा जहां ख़ाक में मिल जाए। मरियम ने ज़ायंदेह-रूद के बीस्तगान में इस दुनिया में क़दम रखा था; एक ऐसी औरत, जिसके १६ जनवरी (२६ देई) को ४१ वर्ष पूरे होने में महज़ कुछ ही दिन बाक़ी थे। मरियम तीन संतानों—२२ वर्ष, ९ वर्ष और ४ वर्ष—की माँ थी; शालीन, शांत और दरियादिल, जिसकी पाकीज़गी और हमदर्दी की मिसाल अपने-बेगाने सभी देते थे, और जब भी किसी ज़रूरतमंद की ख़बर उसे होती, वह ख़ामोशी से बिना किसी दिखावे के उसकी मदद को हाथ बढ़ा देती। वह घर-गृहस्थी सँभालने के साथ-साथ, अपने पति के कंधे से कंधा मिलाकर खेती-किसानी की कड़ी मशक़्क़त में जुटी रहती और उसने अपना पूरा वजूद अपने परिवार पर न्योछावर कर रखा था। मरियम का सबसे बड़ा ख़्वाब मातृ…
مریم ابراهیمی · بیستجان · شهر زاینده رود · اصفهان