अमर नायक मोहम्मद ताजिक; क़रचक से ख़ाक तक
जान गंवाना मोहम्मद ताजिक 41 वर्ष में ईरान क़रचक वरामीन
लेखक: रोशना
९ जनवरी (१९ दे) की तारीख़ है और किसी को नहीं मालूम कि कल इस ज़मीन के सीने से हज़ारों लोग रुख़सत होने वाले हैं। क़रचक-ए-वरामीन का सबसे ग़मगीन गुरुवार तारीख़ के पन्नों पर दर्ज हो रहा है। शहर अब भी अपनी शबाना हलचल में सांस ले रहा है। रात के आठ बजते ही सड़कें आज़ादी-पसंदों से खचाखच भर जाती हैं, जो एक मामूली ज़िंदगी का हक़ मांगने और उसकी आवाज़ बुलंद करने आए हैं। उनकी फ़रियादों की गूंज पूरे शहर में फैल जाती है। उनका हुजूम क़रचक पुलिस थाने की सिम्त बढ़ जाता है। उन्हीं के बीच ४१ बरस का एक बाप, मोहम्मद ताजिक भी दिखाई देता है। वह अपनी बेटियों के मुस्तक़बिल की ख़ातिर अपनी मुट्ठियाँ भींच लेता है। नहीं... यह वह ज़िंदगी हरगिज़ नहीं है जो वह उनके लिए चाहता था। मोहम्मद को यह गवारा नहीं कि उसकी ग्यारह और चार साल की मासूम बेटियों के आने वाले कल को वे ज़ालिम तराशें, जिनकी फ़ितरत में ही पलीती है। किसी को ख़बर नहीं कि कई घंटों पहले से ही आस-पास की इमारतों की छतों पर, जैसे होटल सेंटेनियल की छत पर, निशानेबाज़ घात लगाए बैठे हैं। कोई नहीं जानता कि सितारे उन ख़ाक-नशीनों पर आख़िरी बार अपनी रोशनी बिखेर रहे हैं, जो कल इस दुनिया में नहीं होंगे। लोगों के उस शोर-ओ-ग़ुल में मोहम्मद की चीख़ कहीं गुम हो जाती है। अचानक एक गोली मोहम्मद की गर्दन में आ धंसती है। ख़ून उसके कांधों पर बह निकलता है; वही कंधे जो उसकी बेटियों…
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