अमर नायक सईद शिराली; वह आज़ादी-पसंद जो आज़ादी मार्ग पर ख़ामोश हो गया
जान गंवाना सईद शीराली 22 वर्ष में ईरान तेहरान आज़ादी मार्ग
लेखक: रूदाबेह
८ जनवरी २०२६ (१८ दे १४०४); तेहरान। उस दिन आज़ादी मार्ग एक ऐसे मंज़र का गवाह बन रहा था, जो अपने नाम के अर्थ से कोसों दूर और बेहद कड़वा था; धुआँ, गोलियों की आवाज़ और सड़क पर रुकने व भागने के बीच ज़िंदगी की जंग लड़ते लोग। उस रात आज़ादी मार्ग धुएँ और आँसू गैस की चादर के नीचे साँस ले रहा था। गोलियों की गूँज भीड़ के शोर को चीरती हुई निकल रही थी और चीखें अँधेरे में गुम हो रही थीं। हुकूमत की दमनकारी फ़ोर्स ने सड़क को घेर लिया था, मगर नारों की गूँज अब भी थमी नहीं थी। उसी भीड़ के बीच सईद शिराली भी मौजूद था। उसी रोज़, तेहरान के आज़ादी मार्ग पर, इस्लामिक रिपब्लिक के दमनकारी सुरक्षाबलों की सीधी गोलीबारी में सईद ने अपनी जान गँवा दी। सामने आई जानकारियों के मुताबिक, उसे तीन गोलियाँ लगीं और महज़ २२ साल के एक नौजवान की ज़िंदगी वहीं सड़क पर हमेशा के लिए थम गई। उसकी मौत की वजह अत्यधिक ख़ून बहना बताई गई। लेकिन परिवार के लिए सईद की मौत की त्रासदी उसी लम्हे ख़त्म नहीं हुई। उसका पार्थिव शरीर पहले सुरक्षा एजेंसियों के क़ब्ज़े में रहा और परिवार को सिर्फ़ उसके कपड़े और निजी सामान सौंपे गए; वे चीज़ें जो कुछ घंटे पहले तक एक नौजवान की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थीं और अब उसके वजूद की आख़िरी निशानियाँ बन चुकी थीं। सईद का चालीसवाँ (चेहलुम), इस मातम का एक और दिन था; वह दिन जब परिवार उसकी मज़ार पर इकट्ठा हुआ। उ…
سعید شیرالی · تهران · میدان آزادی