अमर नायक मंसूर शाहसवारी

जान गंवाना मंसूर शाहसवारी 34 वर्ष में ईरान अलिगूदर्स

लेखक: जावेद

मंसूर शाहसवारी—वह शख़्स जिसने बरसों तक कुश्ती के अखाड़े में किसी भी ताक़तवर हरीफ़ से न डरना सीखा था—ने अपनी ज़िंदगी का आख़िरी मुक़ाबला किसी पदक को हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की जान बचाने के लिए लड़ा। चौंतीस बरस का यह पहलवान, जिसने खेल के मैदानों में बार-बार अपने बाज़ुओं की ताक़त का लोहा मनवाया था, ८ जनवरी २०२६ (१८ दे १४०४) की शाम को अलीगुदर्ज़ में पहलवानी की एक नई और अमर परिभाषा लिख गया। उनका जन्म वर्ष १९९१ (१३७०) में हुआ था; वह एक जाने-माने पहलवान थे जिनके नाम देश की युवा कुश्ती चैम्पियनशिप, नौसेना कुश्ती चैम्पियनशिप, सशस्त्र बल कुश्ती चैम्पियनशिप और बॉडीबिल्डिंग चैम्पियनशिप के ख़िताब दर्ज थे। सालों के कड़े अभ्यास, अनुशासन और अनथक परिश्रम ने उन्हें एक बेहद ताक़तवर नौजवान बना दिया था; एक ऐसा इंसान जिसे जानने वाले केवल उनकी जिस्मानी ताक़त के लिए ही नहीं, बल्कि उनकी शराफ़त, दरियादिली और मजलूमों की हिफ़ाज़त करने के जज़्बे के लिए भी पहचानते थे। मंसूर के लिए पहलवानी का मतलब सिर्फ़ अखाड़े में जीत हासिल करने तक सीमित नहीं था; उनकी नज़र में ताक़त का असली मोल तभी था जब वह दूसरों की रक्षा के काम आए। ८ जनवरी (१८ दे) के देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के दौरान, जब सरकारी सुरक्षा बलों ने अलीगुदर्ज़ में 'हौज़ा-ए-इल्मिया अली' के सामने अवाम पर गोलियाँ बरसानी शुरू कीं, तो कुछ बेबस और निहत्थी य…

منصور شاهسواری · الیگودرز · جاویدنامان لرستان · لرستان

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