अमर नायक मोहम्मद अमीन अमीरी; ईरान का सौदा नहीं किया जाता
जान गंवाना मोहम्मद अमीन अमीरी 17 वर्ष में ईरान Zanjan
लेखक: नूरा
«नरगिस, हमने ज़ंजान पर कब्ज़ा कर लिया!» उसकी आवाज़ में इतना उल्लास भरा था कि उसकी बहन ताउम्र उस लहज़े को नहीं भूल पाएगी। उसने कई बार अपने भाई से घर लौट आने की मिन्नत की, लेकिन वह ख़ुशी के मारे बस हँसता रहा। जब फ़ोन कटा, तो किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि वे चंद सेकंड ही परिवार के साथ उसकी आखिरी बातचीत साबित होंगे। मोहम्मद अमीन अमीरी महज़ १७ साल का था। सब उसे एक शांत, संस्कारी और नेकदिल लड़के के रूप में जानते थे; एक ऐसा किशोर जिसने अपनी उम्र से कहीं पहले ज़िम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था। हर रोज़ सुबह ४ बजे वह अपने पिता के साथ काम पर जाता और काम ख़त्म होते ही सीधे ईसीयू (ECU) ट्रेनिंग क्लास के लिए निकल पड़ता। गाड़ियाँ उसके लिए सिर्फ़ एक शौक़ नहीं थीं, बल्कि एक ऐसा मुस्तक़बिल थीं जिसे पाने के लिए वह हर रोज़ एक कदम आगे बढ़ाता था। मोहम्मद अमीन की डायरी में 'ईरान' महज़ एक लफ़्ज़ नहीं था; यह एक ऐसी रूहानी तड़प थी जो उसकी तहरीरों में बार-बार झलकती थी। उसने अपनी लिखावट में मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के कई कथन दर्ज कर रखे थे और अपने हाथ पर शाह के दस्तख़त का टैटू भी बनवा रखा था। जब भी विरोध-प्रदर्शनों की बात चलती, तो वह अपने उसी अटूट और साफ़ यक़ीन के साथ कहता: «हमें तो बस इनसे अपना हक़ छीनना है।» ८ जनवरी २०२६ (१८ दे १४०४) की शाम, क़रीब ६ बजे, वह जल्दबाज़ी में घर से बाहर निकला। ज़ंजान…
محمدامین امیری · زنجان · سبزه میدان