अमर नायक बाबक मतीन-आज़ाद; वह रात जब घर और लालेज़ार के बीच वक़्त ठहर गया

जान गंवाना बाबक मतीन आज़ाद 49 वर्ष में ईरान तेहरान लालेज़ार

लेखक: रोशना

पचास का पड़ाव बाबेक को आवाज़ दे रहा है। उसकी महक नीलोफ़र की गली में तैर रही है; जैसे बहार के मौसम में संतरों की कलियों की भीनी खुशबू। मानो उसके अरमान, रोज़मर्रा की ज़िंदगी की आपाधापी के नीचे से, एक-एक कर सिर उठा रहे हों। वह उस दिन के बारे में सोचता है; उस जश्न के बारे में जो उसकी पचासवीं सालगिरह को सोहरवर्दी सड़क तक खींच लाएगा, उस घर के बारे में जहाँ उसके दो बेटे एक-एक कर ज़िंदगी के रंग उकेर रहे हैं। एक चार साल का है और अभी भी पिता की गोद में सिमट जाता है; दूसरा नौ साल का, पाँच साल बड़ा; जो आहिस्ता-आहिस्ता बचपन को छोड़ रहा है ताकि किशोरावस्था की दुनिया में ज़िंदगी का एक अलग ढंग से तजुर्बा कर सके। बाबेक के दिन दो ठिकानों के बीच गुज़रते हैं: घर और लालेज़ार। सुबह वह घर से निकलता है और खुद को बत्तियों, तारों और इलेक्ट्रॉनिक्स के साज़ो-सामान के बीच पहुँचा देता है। शाम घिरते ही वह उसी राह से लौटता है और फिर घर पहुँच जाता है; उन्हीं कमरों, उन्हीं जानी-पहचानी आवाज़ों के बीच। गोया उसकी ज़िंदगी किसी सड़क के दो किनारे हो; एक तरफ़ दुकानों के शोर और रोशनी से जगमगाता लालेज़ार, तो दूसरी तरफ़ ख़ामोशी और अपनी-सी साँसों से आबाद घर। उससे पहले, उसके पिता नोजेह वायुसेना अड्डे के अफ़सर थे और उसकी माँ, ख़ानम मिर्ज़ाई ने ज़िंदगी के अनगिनत बरस ब्लैकबोर्ड के हवाले कर दिए थे। शुक्रवार की शाम, ९ जनवरी २०२६ (१…

بابک متین آزاد · لاله‌زار · تهران

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