अमर नायक मरियम सादत; मरियम सादत की संतान
जान गंवाना मरियम सआदत 24 वर्ष में ईरान तेहरान
लेखक: मिखक सेपीद
घोर अंधेरा है और एक ऐसी ठंड जो धीरे-धीरे मेरी हड्डियों में उतरती जा रही है। यहाँ वक़्त अब सीधा नहीं चलता। घड़ी, दिन और दूरियों के कोई मायने नहीं रह गए हैं। बस कुछ चुनिंदा मंज़र बचे हैं जो मेरे ज़ेहन में लगातार दोहराए जा रहे हैं; मेरी ज़िंदगी की आख़िरी रात के कुछ बिखरे हुए टुकड़े। मैं मरियम हूँ, चौबीस साल की, और जब भी मुझे वह रात याद आती है, तो गोली की आवाज़ से पहले, ख़ून से पहले, सड़क पर गिरने से पहले, मुझे अपने बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई देती है। सब कुछ डिब्बे का दूध ख़त्म होने से शुरू हुआ था। रात के नौ बज चुके थे। जनवरी (दी) के महीने की कंपकंपाती ठंड खिड़की के काँच पर जम चुकी थी और तेहरान की सड़कें पुरसुकून नहीं थीं। बाहर से ऐसी आवाज़ें आ रही थीं जो किसी को भी घर के भीतर दुबके रहने पर मजबूर कर दें; चीखें, हॉर्न, शोर-शराबा, और कभी-कभार दूर से आती ऐसी आवाज़ जिसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि वह कोई धमाका है या गोलीबारी। मगर मेरा साढ़े चार महीने का मासूम भूखा था। वह अब रो भी नहीं पा रहा था; बस कराह रहा था। खाली बोतल को परे धकेल देता, अपने सूखे तालू पर अपनी नन्ही ज़बान फेरता और हवा में अपनी नन्ही मुट्ठियाँ भींचता और खोलता। मेरी ज़िंदगी तो बस इन्हीं आवाज़ों से नापी जाती थी; उसके सोने के वक़्त से, उसके जागने से, आधी रात के उसके रोने से, उसके कपड़ों से आती दूध की महक से और उसकी उस बिना…
مریم سعادت · نراتا · تهران · نوزاد