अमर नायक मुस्तफ़ा शरीफ़ी शहरिवर; आर्याशहर के साहसी नायक
जान गंवाना मुस्तफ़ा शरीफ़ी शहरीवर 40 वर्ष में ईरान तेहरान आर्याशहर
लेखक: साये
८ जनवरी २०२६ (१८ दी १४०४) की शाम थी। तेहरान का आरियाशहर (सादिक़िएह) का दूसरा चौराहा धुएँ और चीखों के बीच गुम हो चुका था। आँसू गैस की तीखी और दमघोंटू गंध ने फ़ज़ा को बोझिल कर दिया था, और दमनकारी मोटर-साइकिल सवारों के वहशियाना हमले ने फुटपाथों को जंग के मैदान में तब्दील कर दिया था। गोलियों की आवाज़ों और चीख़-पुकार के बीच लोग एक-दूसरे का हाथ थामे पीछे हट रहे थे। उस हंगामे के बीच एक नौजवान का सुगठित क़द-ओ-क़ामत साफ़ नुमायाँ हो रहा था; ४० वर्षीय मुस्तफ़ा शरीफ़ी शहरिवर, जो तेहरान के जन्नत-आबाद मोहल्ले की पयामबर सड़क का रहने वाला था। वह एक अविवाहित युवक था, जिसने अपना सारा प्यार और आत्मीयता अपने परिवार और अज़ीज़ों पर न्योछावर कर रखी थी। मुस्तफ़ा ज़िंदगी, रंगों और नफ़ासत का आशिक़ था; एक ऐसा इंसान जिसके दिन क़ालीनों के हसीन नक़्श-ओ-निगार और दस्तकारी के ताने-बाने के बीच बसर होते थे, और जिसकी रूह फ़रीदून मोशीरी की शायरी की नज़ाकत में रची-बसी थी। मुस्तफ़ा एक ख़ुशमिज़ाज और इंसाफ़पसंद इंसान था, जिसे कसरत का शौक़ था और जिसने एक बेहद मज़बूत व छरहरा बदन तराशा था; मगर अपने जिस्म से भी बढ़कर, उसकी रूह बरसों पहले एक गहरी बेदारी और आगही से रूबरू हो चुकी थी। आज़ादी पर अपने दिली यक़ीन की गवाही के तौर पर उसने अपनी प्रोफ़ाइल पर विजय-चिह्न लगा रखा था, और तमाम ख़तरों के बावजूद उसने उसे कभी नहीं हटाया। उस रात…
مصطفی شریفی شهریور · تهران