अमर नायक मोज़गान एरफ़ानीफ़र
जान गंवाना मोज़गान एरफ़ानीफ़र 40 वर्ष में ईरान सब्ज़ेवार
लेखक: मिखक सेपीद
गारे-मिट्टी की महक और घर की शांत धड़कन सब्ज़वार में सर्दियों की शुरुआत हमेशा सूखी, चुभती ठंड और जमी हुई मिट्टी की महक के साथ होती है; ऐसी ठंड जो कच्ची ईंटों की दीवारों और तंग गलियों से गुज़रती हुई हड्डियों के गूदे तक उतर जाती है। मगर मेरे लिए, ज़िंदगी हमेशा इसी ठंड और कोहरे से भीगी भोर के सीने से फूटती थी। बरसों से मेरी सुबह सूरज निकलने से पहले ही हो जाती थी; उस पहर, जब गोशाला की ठंडी हवा में सांसों की भाप सफ़ेद बादलों की तरह तैरती रहती थी और मैदान का गहरा सन्नाटा सिर्फ़ चारे के हिलने-डुलने और मवेशियों की गर्म सांसों की आवाज़ से टूटता था। मैं, मुज़गान, १५ दिसंबर १९८५ (२४ आज़र १३६४) को जन्मी, एक ऐसी औरत थी जिसने अपनी ज़िंदगी के ताने-बाने को मेहनत, ज़िम्मेदारी और परिवार के प्रति असीम प्रेम से बुना था। प्रायोगिक विज्ञान के क्षेत्र में पढ़ाई और एसोसिएट डिग्री हासिल करने से ज़िंदगी के प्रति मेरे नज़रिए को एक ख़ास सलीक़ा मिला था, मगर मेरा असली सुकून तो इसी मिट्टी, रोज़मर्रा की मशक्कत और उस सादा सी ज़िंदगी में था जिसे हमने अली के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संवारा था। गोशाला में काम करने की वजह से मेरे हाथ भले ही खुरदुरे हो गए थे, मगर रात ढलते ही जब वही हाथ मेरे बेटों की थकी पेशानी को सहलाते, तो पूरे घर में सुकून उतर आता था। अपने मायके में मैं सबसे बड़ी औलाद थी; एक ऐसी बेटी, जिसकी समझदारी और स…
مژگان عرفانی فر · نراتا · سبزوار