अमर नायक फ़रज़ाना जहानबख़्शी; वह माँ, जो अपने बच्चों का हक़ लेने निकल पड़ी

जान गंवाना फ़रज़ाने जहानबख़्शी 45 वर्ष में ईरान तेहरान क़रचक, वरामीन

लेखक: साये

फ़रज़ाना जहानबख़्शी, ४५ वर्षीय, क़रचक, वरमीन की रहने वाली, अपने परिवार की मुखिया और एक १९ वर्षीय बेटी तथा २१ वर्षीय बेटे की माँ थीं। उन्होंने बरसों की मेहनत और कड़े संघर्ष के बल पर ज़िंदगी का बोझ उठाया था और अकेले ही अपने बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी निभाई थी। तय था कि वह जनवरी/फ़रवरी (बहमन माह) में अपनी बेटी की शादी देखेंगी; एक ऐसा दिन, जो उनकी ज़िंदगी के सबसे हसीन और अहम दिनों में से एक हो सकता था। मगर तक़दीर ने उनसे वह दिन देखने का मौक़ा छीन लिया। उन्हीं दिनों, ख़ाली दस्तरख़ानों, अभूतपूर्व महँगाई और भेदभाव से उपजे सुलगते ग़ुस्से ने पूरे ईरान में हलचल मचा रखी थी। आजीविका को लेकर जनता के विरोध-प्रदर्शन दिन-ब-दिन और व्यापक होते जा रहे थे। इस जन-आक्रोश के जवाब में और अवाम की बिखरी हुई आवाज़ों को एकजुट करने के लिए, शहज़ादे रज़ा पहलवी ने एक देशव्यापी आह्वान किया; सड़कों पर उतरने का एक ऐसा आह्वान, जो आर्थिक माँगों के आंदोलन को एक बड़े राजनीतिक संकल्प में बदलने और दुनिया भर के कानों तक राष्ट्र की हक़-परस्त आवाज़ पहुँचाने के लिए था। ८ जनवरी की शाम (१८ देय की शाम), यह पैग़ाम क़रचक तक भी पहुँच गया। फ़रज़ाना, जिन्होंने ख़ुद तंगदस्तियों और अपनी औलादों के अनिश्चित भविष्य के दर्द को अपने पूरे वजूद से महसूस किया था, अपना फ़ैसला कर चुकी थीं। वह वरमीन के क़रचक स्थित मैदान-ए-कलान्तरी पहुँचीं, उ…

فرزانه جهانبخشی · قرچک ورامین · سرپرست خانواده

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