सज्जाद समदी का जीवन और बलिदान

जान गंवाना सज्जाद समदी 24 वर्ष में ईरान गोंबद-ए-कावूस

लेखक: राना

सज्जाद समदी की दास्तान गोनबद-ए-कावूस की एक सड़क से शुरू हुई; वह शहर जो देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के दिनों में सन्नाटे और गोलियों की गूँज के बीच सांसें ले रहा था। सज्जाद २४ साल का था; उसी शहर की आब-ओ-हवा में पला-बढ़ा एक नौजवान, एक सादा ज़िंदगी और ऐसा मुस्तक़बिल लिए जिसे अभी संवरने की मोहलत मिलनी थी। न वह कोई सियासतदां था, न कोई जाना-माना चेहरा; वह भी अनगिनत लोगों जैसा एक आम इंसान था, साधारण सी योजनाओं, काम जारी रखने की उम्मीद, और सुकून भरी ज़िंदगी के एक ख्वाब के साथ। प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की एक गोली उसे आ लगी। अगर हालात सामान्य होते, तो शायद यह ज़ख़्म जानलेवा साबित न होता; मगर सुरक्षा का कड़ा पहरा, कटे हुए संपर्क और अस्पताल तक फ़ौरन पहुँचाने के साधनों का अभाव उसे सड़क पर अपने लोगों के हाथों के बीच बेबस छोड़ गया। सज्जाद गोली लगने के क्षण में नहीं, बल्कि बिना किसी मदद के लगातार बहते ख़ून के सबब दम तोड़ गया; एक ऐसी मौत, जो गोली और उस बेरहम माहौल की मिली-जुली देन थी जिसे इस्लामी गणराज्य ने पैदा किया था। उसकी देह को उसके आबाई वतन ले जाया गया और परिवार व अवाम की मौजूदगी में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया; एक ऐसा जनाज़ा जो सिर्फ़ एक नौजवान की रुख़सती नहीं, बल्कि पूरी एक पीढ़ी को अलविदा कहने जैसा लग रहा था। जब उसका जन्मदिन आया, तो उसकी माँ उसकी मज़ार पर पहुँची। उसने उसका जन्मदिन मना…

سجاد صمدی · گنبدکاووس · رقص سوگ

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