अमर नायक सैयद रज़ा मूसवी

जान गंवाना सैयद रज़ा मूसवी 43 वर्ष में ईरान Zanjan तारोम

लेखक: जावेद

सैयद रज़ा मूसवी की ज़िंदगी तारोम के आब-बर में ज़मीन, बाग़ीचे और मेहनत-मशक़्क़त के बीच बसर हो रही थी। उनके पास बिजली का डिप्लोमा था, मगर उनका दिल कहीं और ही बसता था; उस मिट्टी में जो उनके हाथों के स्पर्श से जी उठती थी, उस खेत में जहाँ वे बटेर और टर्की पाला करते थे, और उस बाग़ में जिसके लिए वे जी-तोड़ पसीना बहाते थे। रज़ा उन मर्दों में से थे जो अपनी मेहनत से ज़िंदगी तराशते हैं और अपनी गाढ़ी कमाई का निवाला अपने परिवार के साथ बाँटकर खाते हैं। वे एक वफ़ादार और बेहद हमदर्द इंसान थे, दूसरों के काम आने वाले; अगर किसी को उनकी मदद की ज़रूरत होती, तो वे अपनी बिसात भर उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते। अपने परिवार के लिए वे एक मज़बूत सहारा थे और अपने तीन बच्चों के लिए एक ऐसे शफ़ीक़ पिता, जो उन्हें दिल-ओ-जान से चाहते थे और उनका सुनहरा मुस्तक़बिल देखना चाहते थे। रज़ा ख़ुदा-तरस इंसान थे और हलाल-हराम की तमीज़ रखते थे। शराफ़त उनके लिए महज़ ज़बानी जमा-ख़र्च नहीं थी; यह उनके जीने के सलीक़े, उनके काम, अपनों के प्रति उनकी वफ़ादारी और ज़रूरतमंदों का हाथ थामने में साफ़ झलकती थी। इसके बावजूद, वे अपने हक़ की आवाज़ उठाने से कभी डरते नहीं थे। ऐसा मुमकिन था कि इंसान ख़ुदा पर ईमान भी रखे, हलाल की रोटी की हुरमत भी बनाए रखे और अवाम पर जो ज़ुल्म गुज़र रहा हो, उस पर ख़ामोश भी न रहे। रज़ा इसी ख़मीर के बने थे;…

سید رضا موسوی · زنجان · طارم

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