جاویدنام ملیحه فیروزهای؛ کرامت انسانی را زیر پا گذاشتند
जान गंवाना ملیحه فیروزهای 32 वर्ष में ईरान बोज्नोर्द فیروزه (محل دفن)
लेखक: अर्शान
मैं मलीहेह फ़ीरोज़ेई हूँ; मुझे लोग महसा कहकर भी पुकारते थे। मैं बोजनूर्द की रहने वाली थी। दे के महीने से पहले के मेरे जीवन के बारे में बहुत कम बातें सामने आई हैं। आज आप मेरे बारे में जो कुछ भी जानते हैं, उसका अधिकतर हिस्सा मेरी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों से जुड़ा है। जनवरी २०२६ (दे १४०४), शहज़ादे रज़ा पहलवी के आह्वान और उस जन-उभार के दिन थे जिसे 'शीर-ओ-ख़ूरशीद' (सिंह और सूर्य) क्रांति का नाम दिया गया। बोजनूर्द में दमन के उन्हीं दिनों में, इस्लामी गणराज्य की हुकूमत के कारिंदों के हाथों मेरी जान ले ली गई। मेरी मौत की दास्तान को लेकर दो अलग-अलग बातें कही जाती हैं। एक के मुताबिक, ९ जनवरी २०२६ (१९ दे) को १७ शहरिवर चौराहे पर मेरे सिर में असली गोली लगी और वहीं मेरी साँसें थम गईं। दूसरी के अनुसार, पहले मुझे छर्रों से छलनी कर ज़ख़्मी किया गया, फिर हिरासत में ले लिया गया और बेइंतहा यातनाएँ देने के बाद मार डाला गया। मेरी मौत का सही वक़्त और इन हादसों का सही सिलसिला आज भी साफ़ नहीं हो सका है। मेरे बेजान जिस्म के बारे में जो ब्योरे सामने आए हैं, वे टूटी हुई हड्डियों, छर्रों के अनगिनत निशानों, जलने के घावों और चेहरे पर गहरे ज़ख़्मों की गवाही देते हैं। यह कभी तय नहीं हो पाया कि इनमें से कौन-सा ज़ख़्म कब दिया गया—ज़िंदगी में या मौत के बाद। मुझे हिरासत में रखकर प्रताड़ित करने की बात तो सामने आई, मगर म…
ملیحه فیروزهای · مهسا فیروزهای · فرزند انقلاب ملی ایران