अमर नायक हमीदरज़ा याक़ूबीज़ादा वनीनी; वह रात जिसने एक परिवार को हमेशा के लिए बदल दिया
जान गंवाना हमीदरज़ा याक़ूबी ज़ादे वनीनी 41 वर्ष में ईरान तेहरान नारमक / सरसब्ज़
लेखक: सफ़र
हमीदरज़ा याक़ूबी वनीनी, उम्र ४१ वर्ष, जन्म ३० जुलाई १९८४ (८ मोरदाद १३६३), माशाअल्लाह याक़ूबी के बेटे और परिवार के इकलौते चिराग़ थे। वह एक नन्हीं बेटी के पिता थे—एक ऐसी बेटी, जिसके साथ उन्होंने अपनी ज़िंदगी और अपनी उम्मीदों का एक बड़ा जहाँ संजोया था। ८ जनवरी (१८ देय) को हमीदरज़ा तेहरान के सरसब्ज़, नारमक इलाक़े में विरोध-प्रदर्शनों में शरीक थे। लेकिन उसी शाम कुछ ऐसा घटा जिसने उनके परिवार की ज़िंदगी को हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। रात के क़रीब ९:३० बजे, हमीदरज़ा के पैतृक घर का टेलीफ़ोन बज उठा। चंद लम्हे पहले तक, घर में वही रोज़मर्रा की चहल-पहल थी; हँसी-ठट्ठे और बातों का सिलसिला जारी था और किसी को गुमान तक न था कि इसी रात सब कुछ हमेशा के लिए बदलने वाला है। परिवार को इत्तला दी गई कि हमीदरज़ा को हिरासत में ले लिया गया है। उनके पिता अपने एक अज़ीज़ के साथ उनकी तलाश में घर से निकल पड़े। ढूँढते-ढूँढते उन्होंने हमीदरज़ा को एक पंचर हुई समंद कार में पा लिया। पिता बदहवास होकर कार तक पहुँचे और बेटे के सिरहाने खड़े होकर पुकारा: «हमीद… हमीद बेटा! मैं हूँ, बाबा…» फिर उसी शफ़क़त और ममता भरे अंदाज़ में, जिसे लेकर उन्होंने कभी सोचा भी न होगा कि अपने लाडले को बचाने की यह उनकी आख़िरी कोशिश होगी, बोले: «गाड़ी का शीशा चढ़ा दो, मेरे बच्चे को ठंड लग रही होगी।» पिता गाड़ी को रास्ते से हटाने में मसरूफ़ हो…
حمیدرضا یعقوبی ونینی · هفت حوض · سرسبز