अमर नायक मसूद बह्मनी
जान गंवाना मसूद बह्मनी 37 वर्ष में ईरान शाहरयार अली आबाद
लेखक: रोझावा
«दरिया में उतरने वाला ही तूफ़ान की मुसीबतें जानता है।» मसूद बह्मनी के एक क़रीबी के लिखे के मुताबिक, यह एक ऐसा जुमला था जिसे वह हमेशा दोहराया करते थे, या कहें कि इस रावी के शब्दों में, यह उनका तकिया-कलाम था। मसूद बह्मनी का जन्म १९८८ (१३۶۷) में अंदिमेश्क शहर में हुआ था। वह मूल रूप से बख़्तियारी क़बीले (चहारलंग-हफ़्तलंग) के सपूत थे; वे लोग जिनकी परवरिश ज़ाग्रोस की गोद में हुई है। जब इंसान कुदरत का हमनशीं बनता है, तो कुदरत उसके लिए माँ जैसी हो जाती है; और यह माँ, चाहे प्यार से हो या सख़्ती से, इंसान की पहली और सबसे बेहतरीन उस्ताद बन जाती है। सब्र, हिम्मत, बहादुरी और ज़िम्मेदारी का अहसास इसी की बुनियादी तालीम हैं। बख़्तियारी क़बीला इसी मदरसे से निकला है, और उन्हीं के दरमियान से अलीक़ुली ख़ान 'सरदार असद बख़्तियारी' सबसे नुमायाँ रहे हैं। लेकिन दिसंबर २०२५ – जनवरी २०२६ (दई १४०४) के गुज़रने ने ईरान के इतिहास में एक ऐसा पन्ना जोड़ दिया, जिसके सूरमाओं की गिनती उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक, आठ महीने बीत जाने के बाद भी बदस्तूर जारी है। मसूद की फ़ितरत ज़ाग्रोस के ख़्वाब और ख़ूज़िस्तान के पानी का अनूठा संगम थी; ज़िंदादिल, मेहरबान, ज़िम्मेदार और जाँबाज़। ये बातें मैंने उन लोगों से बार-बार सुनीं जो उन्हें जानते थे, और उन लेखों में पढ़ीं जो उनकी शहादत के बाद लगातार प्रकाशित हुए। और उनके इस द…
جاویدنامان ایل بختیاری · شهریار · مسعود بهمنی