अमर नायक अली मेहरी; सैलून के आईनों से लेकर चमनूर की मिट्टी तक
जान गंवाना अली मेहरी 16 वर्ष में ईरान ज़रीन शहर
लेखक: नफ़स
अली मेहरी, १६ वर्षीय किशोर, इस्फ़हान के ज़र्रीन-शहर का रहने वाला था। उसे सजने-संवरने और ख़ूबसूरती से ख़ास लगाव था। हाल ही में उसने केश-सज्जा का प्रशिक्षण पूरा किया था और बतौर हेयरड्रेसर काम शुरू किया था। उसका ख़्वाब था कि वह एक दिन अपने शहर के बेहतरीन हेयरड्रेसरों में गिना जाए। इंस्टाग्राम पर उसके एक दोस्त ने लिखा है कि अली को आईने के सामने अपनी तस्वीरें खींचने का बेहद शौक था। परिचित और दोस्त उसे एक अत्यंत दयालु, निश्छल और साहसी इंसान के रूप में याद करते हैं। अली इमाम हुसैन का सेवक था और हर साल मुहर्रम के मातम में अज़ादारों के बीच शरीक रहता था। उसे हुसैन पारसा का तराना «काशकी ये बारून बेज़ने» (काश कोई बारिश बरसे) बहुत पसंद था और वह अक्सर इसे सुना करता था। शहज़ादे रज़ा पहलवी ने ६ जनवरी २०२६ (१६ दे १४०४) को एक वीडियो संदेश जारी कर अपना पहला आधिकारिक आह्वान किया, और अली ने भी इस पुकार पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी तथा ८ जनवरी २०२६ (१८ दे १४०۴) को, अपनी ही पीढ़ी के तमाम नौजवानों की तरह, विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो गया। उसी दिन की शाम, बेहद नज़दीकी फ़ासले से इस्लामी गणतंत्र के दमनकारी बलों ने उसे अपनी गोलियों का निशाना बना दिया। रिपोर्टों से ज़ाहिर होता है कि २०० से अधिक धातु के छर्रे और एक युद्धक गोली उसके जिस्म में दागी गई। छर्रे उसकी आँखों, गर्दन, सीने और हाथों में जा धंसे, जबकि गोली…
زرینشهر · علی مهری · نوجوان