अमर नायक नासेर जहानबीन
जान गंवाना नासिर जहानबीन 25 वर्ष में ईरान क़ेशम
लेखक: रोझावा
काम की तलाश में पलायन, बिसरा दी गई ज़मीनों के अनगिनत नौजवानों की तयशुदा और लाचार तक़दीर है। एक ऐसे भूगोल में, जिसके ताने-बाने पर दशकों से आर्थिक और ढांचागत पिछड़ेपन का साया मंडरा रहा हो, वहाँ टिकना और ज़िंदगी संवारना कभी-कभी सबसे नामुमकिन ख़्वाहिश बन जाता है। सीस्तान और बलूचिस्तान में पल-बढ़ रहे युवाओं के लिए, जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखना कड़वी विदाईयों, हल्के-फुल्के बोरिया-बिस्तरों और अनजाने दूरदराज़ रास्तों के मुहाने पर खड़े होने का पर्याय बन जाता है; ऐसे रास्ते जो अनिच्छापूर्वक अपनी जन्मभूमि को छोड़ने, घर-परिवार की गर्माहट से नाता तोड़ने और इस मुल्क के दूर-दराज़ कोनों में भटकने की ओर ले जाते हैं। यह कठिन हिजरत किसी नए तजुर्बे की तलाश नहीं, बल्कि महज़ रोज़मर्रा की ज़िंदगी और वजूद की बक़ा का एक पूरी तरह लाचार जवाब है; एक ख़ामोश और सब्र भरी जंग, ताकि मुफ़्लिसी के रूबरू खाली हाथ कम-से-कम इंसानी वक़ार और हलाल की रोटी की इज़्ज़त को बचाए रख सकें। नासिर जहाँबीन, वल्द अब्दुल क़ादिर, २५ वर्ष की उम्र में इसी थोपी गई नियति की साक्षात मूरत थे; एक बलोच नौजवान, जिसकी भरी जवानी और उमंग के दिन अपने पैतृक घर से मीलों दूर, परदेस की पीड़ा और दो वक़्त की रोटी जुटाने के भारी बोझ के तले शुरू हुए। उनकी जन्मभूमि ने जीने और मुस्तक़िल रोज़गार की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी थी; इसलिए उन्होंने अपने परिवार का पेट…
جاویدنام ناصر جهانبین · سیستان و بلوچستان · ناصر جهانبین