अमर नायक पूरिया ग़ुलामअली
जान गंवाना पूरिया ग़ुलामअली 32 वर्ष में ईरान तेहरान هفتحوض
लेखक: नफ़स
पूरिया ग़ुलामअली ३२ वर्ष के थे और तेहरान के ही रहने वाले थे। उन्होंने अपने जन्म के समय से ही बड़े भावनात्मक झंझावातों का सामना किया था। उनके जन्म के तुरंत बाद उनके माता-पिता अलग हो गए और उनके पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी उनकी दादी पर आ गई। बहुत समय तक तो वे अपनी दादी को ही अपनी माँ समझते रहे। जब पूरिया छोटे ही थे, तभी उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया था। दादी के देहांत के बाद पूरिया बिल्कुल अकेले पड़ गए और फिर उन्होंने अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी की शुरुआत की। वे बेहद नेक दिल और दयालु इंसान थे और उन्हें प्रकृति के बीच घूमने-फिरने का ख़ास शौक़ था। वे गली के बेज़ुबान जानवरों के लिए खाने का इंतज़ाम करते और हमेशा उनकी देखभाल में लगे रहते थे। १२ दिनों के युद्ध के दौरान, उन्होंने घायलों और ज़रूरतमंदों की मदद के लिए प्राथमिक उपचार के सामान से भरा एक बैग तैयार कर रखा था। तकनीक और कंप्यूटर की दुनिया से उन्हें बेपनाह मोहब्बत थी, और तेहरान के सोहरवर्दी इलाक़े में मोबाइल व कंप्यूटर की बिक्री और मरम्मत की उनकी अपनी दुकान थी। आर्थिक रूप से उनकी स्थिति काफ़ी अच्छी थी और विरोध-प्रदर्शनों में उनकी मौजूदगी का कोई भौतिक कारण नहीं था। वे केवल ईरान की आज़ादी की ख़ातिर सड़कों पर उतरे थे। दुनिया से रुख़सत होने से पहले उनकी कही एक बात आज भी याद की जाती है, जो उनके हौसले को बयां करती है: «अगर मैं मारा जाऊँ, तो मेरे…
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