अमर नायक सेपेहर अफ़राज़े; तुम्हें ईश्वर की गोद में सौंपता हूँ
जान गंवाना सेपेहर अफ़राज़े 31 वर्ष में ईरान इस्फ़हान शाहीन शहर - सीमीन तिराहा
लेखक: नूरा
कभी-कभी मौत किसी इंसान के जीवन पर इस कदर साया डाल देती है कि उससे पहले का सब कुछ उसके अंतिम दिन के पीछे छिप जाता है। मगर सेपेहर अफ़राज़े को जानने के लिए ९ जनवरी (१९ देई) के साए से बाहर निकलना होगा; उसकी ज़िंदगी के दिनों को एक-एक कर पलटना होगा और उनमें उस शख़्स को तलाशना होगा जिसने ज़िंदगी को अपने ही अंदाज़ में जिया—इससे पहले कि एक गोली उसके आख़िरी दिन को उसकी ज़िंदगी का सबसे जाना-पहचाना दिन बना देती। सेपेहर की ज़िंदगी के पन्ने पलटें तो संगीत बहुत है और रक़्स उससे भी ज़्यादा। कहीं वह महफ़िल के बीच नाच रहा है, तो कहीं गाड़ी में बैठा धुन की लय पर कंधे मटका रहा है। उसकी तस्वीरें भी कम नहीं हैं; सूट-बूट में सजीला सेपेहर, गाड़ियों के पास खड़ा सेपेहर, नीले वेस्पा पर सवार सेपेहर, और वह मुस्कान जो उसके साथ एक तस्वीर से दूसरी तस्वीर तक चली जाती है। इन सबके बीच तीन लोगों के रक़्स का एक वीडियो भी है; माँ बीच में खड़ी हैं, एक तरफ़ सेपेहर है और दूसरी तरफ़ उसका बड़ा भाई। यह महज़ कुछ सेकंड का है, लेकिन इन्हीं चंद पलों के पीछे बरसों की तपस्या छिपी है; वे बरस जब माँ ने अपने दोनों नन्हे बेटों की उँगली थामी और बिना किसी सहारे के उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया। सेपेहर बमुश्किल दो साल का था जब उसने अपने पिता को खो दिया। उसके बाद माँ रह गई और उसके दो बेटे; एक ऐसी माँ जिसने दोनों के लिए मातृत्व का हर फ़र्ज़ प…
سپهر افرازه · فوقلیسانس بازرگانی · شاهینشهر · اصفهان