अमर नायक अहमदरज़ा क़ादरी; क्या मेरा ख़ून दूसरों से ज़्यादा लाल है

जान गंवाना अहमदरेज़ा क़ादरी 25 वर्ष में ईरान बबल

लेखक: सफ़र

बाबोल नोशिरवानी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में विनिर्माण एवं उत्पादन इंजीनियरिंग के वर्ष २०२० (प्रवेश बैच १३९९) के छात्र, अहमदरेज़ा क़ादेरी महज़ २५ वर्ष के नौजवान थे। पाँच साल तक उन्होंने घरेलू उपकरणों की मरम्मत की दुकान में अपने पिता के साथ काम किया। वह पिता का दायाँ हाथ और उनका सच्चा सहारा थे; पिता ने उनके बारे में कहा था: «अगर वह न होता, तो मेरा आधे से ज़्यादा काम अटका ही रह जाता।» अहमदरेज़ा उन नौजवानों में से थे, जिन्होंने अपनी उम्र से पहले ही ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियों को समझ लिया था; सुबह विश्वविद्यालय और पढ़ाई, और साथ में काम तथा पिता का हाथ बंटाना। मगर उनके वजूद में कुछ ऐसा था, जो बचपन से ही उन्हें नाइंसाफ़ी देखकर चुप नहीं रहने देता था। वे हक़ की बात खुलकर कहते थे, भले ही जानते हों कि इसका ख़ामियाज़ा उन्हें ख़ुद भुगतना पड़ सकता है। शायद यही वजह थी कि बरसों पहले, जब वे महज़ एक बच्चे थे, अपनी बुआओं से कहा करते थे: «मैं आख़िरकार ईरान की आज़ादी की राह में शहीद हो जाऊँगा और आप सब एक शहीद की बुआ कहलाओगी।» उस वक़्त परिवार के लिए वह बात शायद सिर्फ़ एक बच्चे की नादानी थी; एक ऐसी बात जिसे अनसुना किया जा सकता था और बचपन की ख़ाम-ख़याली मानकर भुलाया जा सकता था। मगर बरसों बाद, वही बात परिवार की यादों में हमेशा के लिए गूँजती रह गई; जैसे दूर कहीं से आती कोई आवाज़ हो। ८ जनवरी (१८ देय) की सुब…

احمدرضا قادری · دانشگاه نوشیروانی · بابل

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