अमर नायक हसन फ़लाही सराईलानी; कंधे पर परचम, रूह में ईरान

जान गंवाना हसन फ़लाही सराईलानी 28 वर्ष में ईरान करमानशाह शहरक इलाहिया

लेखक: नूरा

शाहरक-ए-इलाहिया में, फ़ल्लाही परिवार से कई लोग वाक़िफ़ थे; माँ को उनकी पारंपरिक रोटियों की ख़ुशबू से जाना जाता था, पिता को बरसों की ड्राइविंग और उनकी शराफ़त से, और हसन को उसके नेक उसूलों, साफ़गोई और चैम्पियनशिप के लिए। वह एक ऐसा नौजवान था जिसने ग्राफ़िक्स की पढ़ाई की थी, एमडीएफ़ का काम करता था और अपने दिन की शुरुआत तड़के ही करता था। शाम ढलते ही, वह दिन भर की थकान समेटे जिम पहुँच जाता। उसने वेटलिफ़्टिंग की थी और ख़िताब जीता था, कभी-कभार फ़ुटबॉल खेलता था और दिल से पर्सेपोलिस टीम का मुरीद था। मगर घर में लोग उसे इन सबसे बढ़कर दूसरी बातों के लिए जानते थे; उसकी मेहरबानी, उसकी हमदर्दी, उसके आचरण में बसी शराफ़त के लिए, और इस बात के लिए कि अगर परिवार में से कोई उस पर टेक लगाता, तो हसन चट्टान बनकर वहीं खड़ा मिलता। ईरान की आज़ादी हसन का सबसे बड़ा ख़्वाब था; एक ऐसा ख़्वाब जो ज़िंदगी से मिलने वाले उसके अपने हिस्से से कहीं बड़ा था, उस अमन-ओ-सुकून से कहीं बड़ा जिसे वह महज़ अपने लिए चाह सकता था। उसका दिल एक आज़ाद ईरान चाहता था; और यही ख़्वाहिश, उसकी हर ज़ाती चाहत से कहीं ऊँची खड़ी थी। देई का महीना आ पहुँचा था, मगर सड़कों पर अभी उस तरह ख़ून नहीं बहा था जैसा कुछ दिनों बाद जम जाने वाला था। मुख्य आह्वाहन अभी जारी नहीं हुए थे, मगर हसन ने जब अवाम को देखा, तो उसने भी सड़कों की ओर अपना रुख़ कर लिया। ९ जनव…

حسن فلاحی سرائیلانی · کرمانشاه · وزنه بردار · حسن فلاحی

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