अमर नायक मोहसिन रशीदी ख़ानीआबादी; एक सपने की हिफ़ाज़त
जान गंवाना मोहसेन रशीदी खानी-आबादी 42 वर्ष में ईरान इस्फ़हान बहारिस्तान
लेखक: नूरा
मोहसिन की आवाज़ वह अनदेखा धागा थी, जो घर के ताने-बाने में स्नेह और अपनत्व पिरोती थी। जब वह गाता, तो लगता मानो शब्द उसके कंठ से नहीं, सीधे दिल की गहराइयों से फूट रहे हों। उसकी आवाज़ में एक गर्मजोशी और गूंज थी, जो कभी अखाड़े के शोर-शराबे के बीच बुलंदी छूती, तो कभी घर के एकांत में किसी लोरी की तरह नज़ाकत से बिखर जाती। संगीत उसकी रूह में बसा था और कविता उसके जज़्बातों की दूसरी ज़बान थी। गोया दिल की बात बयां करने के लिए यह एक जहां भी कम पड़ता था; वह क़लम से नज़्में बुनता, हाथों से तस्वीरें तराशता और अपनी आवाज़ से अनकहे अहसासों में जान फूंक देता था। घर में, जब वह अपनी नन्हीं बेटी को सीने से लगाता, तो वही बुलन्द आवाज़ मद्धम पड़ जाती और बच्चे के कानों में "लोरी-लोरी, प्यारे फूल" की सुरीली सरगोशी तैरने लगती। मोहसिन असीम स्नेह और विस्मय के साथ अपनी बच्ची का चेहरा निहारता; गोया अपनी बांहों में सिमटे इस असीम सौंदर्य को देखकर उसका दिल अब भी न भरा हो। उस नज़र के पीछे वह कैसे-कैसे दूरदराज़ और रोशन भविष्य के ख़्वाब बुनता था! उसे बड़ा होते देखने की कितनी उमंग थी, उस दिन की कैसी प्रतीक्षा थी जब उसकी बच्ची की हर आरज़ू साकार हो और इस सारी ख़ुशियों में एक पिता का हिस्सा महज़ एक संतुष्ट मुस्कान बनकर रह जाए। सानाज़ और उनकी तीन बेटियाँ उसकी ज़िंदगी का सबसे अज़ीज़ मौसम थीं; ऐसा मौसम जिसके कभी पतझड़ में न ब…
محسن رشیدی خانیآبادی · اصفهان · بهارستان