अमर नायक मीसम रहमती तरकाशवंद; एक खामोश विरोध की गूँज
जान गंवाना मेसम रहमती तोरकाशवंद 30 वर्ष में ईरान शाहरयार फ़ेज़ १, अंदेशे
लेखक: मिखक सेपीद
शहरयार की भीड़भाड़ भरी और धूल-धूसरित बस्तियों में, जहाँ कारखानों का शोर मजदूर तबके की खामोश मायूसी में घुला-मिला था, मैसम रहमती रहता था। तीस बरस का एक नौजवान, जिसके चेहरे पर उम्र की नहीं, बल्कि ज़िंदगी भर की मशक्कत और रंज-ओ-ग़म की लकीरें खिंची थीं। तूयसरकान के क़ासिमाबाद गाँव का एक कुर्द, जिसने बचपन से ही—पाँचवीं जमात से ही—परिवार का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था। जब पिता में काम करने की ताकत न रही, तो मैसम जैसा नेक और हमदर्द बेटा घर का सहारा बन गया। वह रोज़ी-रोटी की तलाश में शहरयार आया, ‘मीनू’ कंपनी में काम करने लगा, और अपने काम की जगह पर सबका चहेता और शांत मिज़ाज इंसान था। उसने ब्याह भी रचाया, मगर कुछ ही बरसों में माली तंगहाली ने उसकी गृहस्थी बिखेर कर रख दी। इस ज़ाहिरी सुकून के पीछे मैसम के सीने में बगावत की एक आग धधक रही थी। वह अक्सर कहता: «इन्होंने हमारी जवानी छीन ली, तबाह कर दी। इस बेमकसद भागदौड़ और मज़दूरी से मैं तंग आ चुका हूँ।» ८ जनवरी (१८ देह) की रात, शहज़ादे रज़ा पहलवी के आह्वान पर वह खुद को रोक न सका और अपने विरोध की आवाज़ बुलंद करने सड़कों पर उतर आया। एक गोली उसके पैर में लगी, वह घायल हो गया, मगर उसका हौसला और पक्का हो गया। अगले दिन, ९ जनवरी (१९ देह) को, घरवाले उसके आगे गिड़गिड़ाए कि बाहर न जाए। «मैसम, कल रात तुम ज़ख्मी हो गए थे, वे तुम्हारी तलाश में हैं!» मगर वह ठान चु…
میثم رحمتی ترکاشوند · شهریار · نراتا · اندیشه