अमर नायक रज़ा दरवीशी; आख़िरी अधूरा मॉडल
जान गंवाना रेज़ा दरवीशी 27 वर्ष में ईरान इस्लामाबाद पश्चिम शाबाद
लेखक: साये
रेज़ा दरवेशी के कमरे से अब भी ट्रेसिंग पेपर की महक और नए विचारों से लबरेज़ उसके ज़ेहन का अहसास आता है। काम की मेज़ पर एक अधूरा नक्शा यूं ही छूटा पड़ा है; वे समानांतर रेखाएं, जिन्हें आने वाले कल के लिए एक महफ़ूज़ छत और मज़बूत दीवारें तामीर करनी थीं। १२ अगस्त १९९८ (२१ मोरदाद १३७७) को जन्मे २७ वर्षीय युवा वास्तुकार रेज़ा, इस्लामाबाद-ए-ग़र्ब (शाहाबाद) की ही मिट्टी में पले-बढ़े थे। वह हमेशा अपने इर्द-गिर्द की दुनिया को और अधिक सुंदर, संतुलित और मानवीय रूप में ढालने की कोशिश में रहते थे। वह अमनपसंद, दृढ़निश्चयी, बारीक़बीन और समाज के प्रति बेहद संवेदनशील नौजवान थे, और लोगों के बीच बेइंतहा अज़ीज़ थे। रेज़ा के लिए वास्तुकला महज़ इमारतें बनाना नहीं, बल्कि सुकून की ज्यामिति और ज़िंदगी को खुला आसमान देने का जरिया थी। जब वह समाज की ओर देखते, तो उन्हें एक ऐसा ढांचा दिखाई देता जिसकी बुनियादें नाइंसाफ़ी से खोखली हो चुकी थीं और जिसकी छत उनकी ही पीढ़ी की उम्मीदों पर भारी पड़ रही थी। सड़कों पर उतरने और जनांदोलन के लिए शहज़ादा रेज़ा पहलवी के राष्ट्रीय आह्वान के साथ ही, उन्होंने अदम्य साहस दिखाते हुए अपने पैमाने और परकार एक तरफ रख दिए और अवाम के भारी हुजूम में शामिल हो गए। उनका पक्का यक़ीन था कि कोई भी आशियाना तामीर करने से पहले वतन को नए सिरे से संवारना ज़रूरी है; वह उन ख़्वाबों के मेमार थे, जिनकी खिड…
رضا درویشی · اسلام آباد غرب · مهندس