अमर नायक ज़हरा मोरादी

जान गंवाना ज़हरा मोरादी 27 वर्ष में ईरान तेहरान तेहरानसर

लेखक: रअना

मैं ज़हरा हूँ। एक ऐसी औरत जिसने आज़ादी की राह में अपनी जान गँवा दी। मैं सत्ताईस बरस जी; एक सादा ज़िंदगी, मगर मेरे अपने लिए रंगों और अर्थों से भरी हुई। बोकान की एक लड़की, हिसार सड़क की रहने वाली; एक ऐसी जगह जहाँ पहाड़ हमेशा आँखों के सामने रहते हैं और हवा में घास और मिट्टी की सोंधी महक बसी होती है। मेरा बचपन उन्हीं पहाड़ों के दरमियाँ बीता, कुर्दिश लोरियों के आगोश में, उन औरतों के बीच जो मुश्किलों से वाक़िफ़ थीं मगर अपने होठों से मुस्कान कभी खोने नहीं देती थीं। शायद वहीं मैंने सीखा था कि औरत होने का मतलब नज़ाकत भी है और हौसले की दृढ़ता भी। बरसों पहले हम तेहरान आ गए थे। शहर बहुत बड़ा था, परदेसी था, मगर मैंने सीख लिया कि उसकी भीड़-भाड़ के सीने में भी अपनी ज़िंदगी कैसे बसाई जाती है। मैं ब्यूटीशियन बन गई; मेरा काम ज़िंदगी को छूना था। मेरे हाथ बालों को सँवारते थे, मगर दरअस्ल वे दिलों को सुकून पहुँचाते थे। आईने में दिखने वाली हर मुस्कान मानो मेरी अपनी ही उम्मीद का एक टुकड़ा हुआ करती थी। नई-नवेली दुल्हन थी मैं। शादी को कोई दो साल ही बीते थे। हमारे घर से एक नयापन महकता था, एक नई शुरुआत की ख़ुशबू, मुस्तक़बिल को सजाने की महक। हम पर्दों के रंगों पर बहस करते, सफ़र के ख़्वाब बुनते, और उस बच्चे के लिए नाम चुनते जो शायद चंद बरसों बाद हमारी गोद में आता। मैं एक औरत थी; कुछ नया रचने की चाहत से लबरेज़,…

زهرا مرادی · آرایشگر · تهرانسر · بوکان

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