جاویدنام عذرا مهدی نژاد؛ کوچهای میان خانه و خاک
जान गंवाना अज़रा मेहदी नेज़ाद 57 वर्ष में ईरान ख़ूज़ेस्तान اندیمشک
लेखक: रोशना
उस रात 'बुनबस्त-ए-शोहदा' से आगे निकलने की कोई राह न बची थी; वह गली, जो हमेशा घर तक पहुँचाती थी, इस बार स्याह अँधेरे और चीख़-पुकार में गुम हो चुकी थी। आज़ादी की पुकारें धुएँ, आँसू गैस और गोलियों की गूँज के बीच दम तोड़ रही थीं। लोग दीवारों और मकानों के दरवाज़ों की ओट में पनाह लेकर बचने की राह ढूँढ़ रहे थे, मगर गोलियाँ हर दिशा से बरसी आ रही थीं। उस रात, बुनबस्त-ए-शोहदा अब घर पहुँचने का रास्ता न रही थी; वह तो ऐसी राह बन चुकी थी जिसने प्रदर्शनकारियों को ज़िंदगी और मौत के मुअल्लक़ घेरे में बाँध रखा था। जैसे-जैसे फ़ायरिंग तेज़ होती गई, प्रदर्शनकारी वहाँ पनाह लेने खिंचे चले आए; उन घरों से बस चंद क़दम दूर, जिनकी दीवारों के पीछे ज़िंदगी गली में गुज़र रहे क़हर से बेख़बर अब भी रवाँ थी। अज़रा मेहदी-नेज़ाद भी पड़ोसियों के बीच खड़ी थीं, ठीक अपने उस घर के सामने जहाँ वह बरसों से जीती आई थीं। गोलियों की तड़तड़ाहट धीरे-धीरे इस बंद गली तक आ पहुँची और उनमें से एक गोली अज़रा के सर में जा धँसी। ५७ साल की एक औरत, जो अपने घर से टेक लगाए—अपनी उसी पनाहगाह और आशियाने के सहारे—उजले दिनों के ख़्वाब देख रही थी। कोई नहीं जानता कि अज़रा किस हसरत के ख़याल में डूबी थीं जब उनका दिल थम गया; गुज़रे हुए दिनों और अभी न आने वाले कल के किसी दरमियानी मोड़ पर। अज़रा की ज़िंदगी वहीं ख़त्म हो गई, गली और घर के बीच की उस धुंधली…
عذرا مهدینژاد · اندیمشک · مادر