अमर नायक अली करमअली

जान गंवाना अली करमअली 23 वर्ष में ईरान तेहरान परंद

लेखक: अनाहिता

अली करम-अली की उम्र महज़ तेईस साल थी, जब उसने एक बेहतर ज़िंदगी की तलाश में तेहरान जाने का फ़ैसला किया। वह तेहरान के पास बसे शहर परंद में रहता था और अक्सर राजधानी और अपने वतन के बीच आता-जाता रहता था। अली हमदान प्रांत के नहावंद ज़िले में स्थित गोम्बद-ए कबूद गाँव का रहने वाला था; वह जगह जहाँ उसका परिवार बसता था और जहाँ उसकी ज़िंदगी और यादों की जड़ें गहरी जमी थीं। मगर एक बेहतर मुस्तक़बिल संवारने के लिए अली का यह सफ़र किसी सुखद मोड़ पर न पहुँच सका। सामने आई जानकारियों के मुताबिक़, उन्नीस देह (९ जनवरी) की शाम, परंद शहर में विरोध-प्रदर्शनों के दौरान अली पर सीधी गोलियाँ चलाई गईं, जिससे उसने दम तोड़ दिया। पाँच दिनों बाद अली का पार्थिव शरीर उसके परिवार को सौंपा गया, जिसके बाद उसे उसके पैतृक गाँव, नहावंद के गोम्बद-ए कबूद ले जाया गया और कड़े सुरक्षा पहरे के बीच सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया। अपने भाई के सोग में डूबी अली की बहन ने उन पाँच दिनों को याद करते हुए, जब उसके भाई का जिस्म किसी गोदाम में बेजान पड़ा था, उन सवालों का ज़िक्र किया है जो उसकी मौत के बाद से उसका पीछा नहीं छोड़ते: «मेरी जान, मेरे भाई, जानती हो मैं क्या सोच रही हूँ? यही कि वो पाँच दिन जब तुम्हारा बेजान जिस्म उस ठंडी ज़मीन पर पड़ा था, तो वहाँ से गुज़रने वालों के पाँव कहीं तुमसे तो नहीं टकराए? तुम्हें तकलीफ़ तो नहीं हुई होगी ना? आख़…

علی کرمعلی · پرند

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