अमर नायक इदरीस दरवेशवंद; ख़ाक पर एक सेज
जान गंवाना इदरीस दरवीशवंद 25 वर्ष में ईरान क़ज़्विन अलवंद
लेखक: मिखक सेपीद
क़ज़्वीन के अलवंद शहर में स्थित ‘बहेश्त-ए-फ़ातिमा’ क़ब्रिस्तान का आसमान एक गहरे अवसाद और भारी घुटन के बोझ तले दबा हुआ था। काले लिबास में लिपटे सोगवारों के हुजूम के बीच, दफ़ की गूँजती, पुरदर्द थाप और संतूर के तारों पर मिज़राब की सिसकियाँ एक साथ फ़ज़ा में गूँज रही थीं। लकी भाषा के करुण शोकगीत एक अज़ीब से सोज़ के साथ हवा में तैर रहे थे, जो हर सुनने वाले के कलेजे को छलनी किए दे रहे थे। यहाँ, एक अनंत जुदाई के चालीसवें दिन, दरवेशवंद परिवार ने कोई आम मातम की मजलिस नहीं, बल्कि अपने बेटे की प्रतीकात्मक 'ख़ूनी शादी' की रस्म सजा रखी थी। मिट्टी की वह मज़ार सफ़ेद और पीले गुलदाउदी के अनगिनत फूलों के ढेरों तले ओझल हो चुकी थी। इस ग़मगीन महफ़िल के बीचों-बीच, शफ़्फ़ाफ़ प्यालों में मोमबत्तियों की काँपती लौ रक़्स कर रही थी, और दूल्हे के उस लिबास के प्रतीक के रूप में—जो वह कभी पहन न सका—एक मर्दानी कमीज़ उस क़ब्र के सिरहाने ख़ामोश रखी हुई थी। क़ब्र पर रखे फ़्रेम में, क़ुदरत की गोद में मुस्कुराते और बा-वक़ार चेहरे वाली उसकी तस्वीर आने वाले ग़मज़दा लोगों को देखकर मुस्कुरा रही थी। ग़म की मार से झुकी कमर वाले उसके वालिद 'फ़तहुल्लाह', लगातार बहते आँसुओं से बेनूर हो चुकी आँखों वाली माँ, उसका छोटा भाई 'अमीरअली' और ग़मगीन इकलौती बहन—इस तल्ख़ महफ़िल के बीच हाज़िरीन में 'शाह-दूल्हे का नेग' बाँट रहे थे; एक ऐसा नेग…
ادریس درویشوند · نراتا · قزوین · ورزشکار