अमर नायक मोहम्मद जवाद हुज़ूरी

जान गंवाना मोहम्मद जवाद हुज़ूरी 32 वर्ष में ईरान तेहरान तेहरानपार्स

लेखक: रोझावा

बहमन के महीने की कड़कड़ाती ठंड ने तेहरानपार्स की गलियों और कूचों को अपने आगोश में ले रखा था, मगर 'मेहरी' और 'अकबर' के आशियाने में एक मीठे इंतज़ार की तपिश हिलोरे ले रही थी। दीवार घड़ी की सुइयां २२ जनवरी (२ बहमन) की ठीक दोपहर १२ बजे आकर ठहर गईं, जब एक नवजात की पहली रुलाई ने घर के सर्द सन्नाटे को तोड़ा; एक बेटा, जिसका नाम उन्होंने 'मोहम्मद जवाद' रखा। वह सिर्फ़ ख़ानदान का बड़ा बेटा बनकर ही नहीं आया था, बल्कि गुज़रते बरसों में घर का मज़बूत सुतून, माँ की तन्हाइयों का हमदम और वालिद के लिए एक महफ़ूज़ सहारा व बेमिसाल साथी बन गया। मोहम्मद जवाद तेहरान के उसी पूर्वी इलाक़े में परवान चढ़ा और एक ऐसा नौजवान बना, जिसने चौड़े कंधों और कुशादा दिल के साथ घर की रोज़ी-रोटी की भारी ज़िम्मेदारी अपने सर ली। उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी एक बा-इज़्ज़त और लगातार की जाने वाली जद्दोजहद की जीती-जागती तस्वीर थी। उसकी सख़ावत और मेहमाननवाज़ी का दस्तरख़्वान हमेशा दूसरों के लिए खुला रहे और ख़ानदान की ज़िंदगी का पहिया पूरी इज़्ज़त के साथ घूमता रहे, इसके लिए वह दो-दो मोर्चों पर पसीना बहाता था; दिन के कुछ घंटे वह एक प्रॉपर्टी डीलर के दफ़्तर में गुज़ारता और बाक़ी दिन बैटरी बनाने-सुधारने की अपनी किराए की दुकान में, अपने हुनरमंद हाथों से हलाल रिज़्क़ कमाने में जुटा रहता। लेकिन जो बात मोहम्मद जवाद को अपने दोस्तों और अज़ीज़ों…

محمدجواد حضوری · تهران · تهرانپارس · ورزشکار(کیوکوشین)

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