अमर नायक रुस्तम मुबारक-आबादी; आज का रुस्तम, जनता के बीच का एक पहलवान
जान गंवाना رستم مبارک آبادی 30 वर्ष में ईरान इस्फ़हान मुबारक हो!
लेखक: साये
हमें क्या खबर थी कि ईरान की कोख में इतने रुस्तम, सोहराब, सियावाश और इसफ़ंदियार पल रहे हैं। या इतनी रूदाबा और गर्दाफ़रीद, जिनमें से हर कोई दर्द, अडिगता और उम्मीद की एक दास्तान अपने सीने में समेटे हुए है। आज के दौर की मिट्टी से जन्मा एक रुस्तम—रुस्तम मुबारक-आबादी; ईरान का सपूत, ३० बरस का एक नौजवान, ट्रक ड्राइवर और इस्फ़हान के मोबारकेह का रहने वाला। एक ऐसा मर्द, जिसकी ज़िंदगी के बरसों-साल ट्रक के स्टीयरिंग के पीछे और सड़कों की गर्द में गुज़रे; मेहनत-मशक्कत से गट्टे पड़े हाथ और गृहस्थी की गाड़ी खींचने की जद्दोजहद में खपते दिन। ९ जनवरी (१९ देई-माह) को, मोबारकेह की सड़कें ऐसे नौजवानों से भरी पड़ी थीं, जो अपने हाथों में जो कुछ भी मिला उसी से छोटे-छोटे मोर्चे बना रहे थे—शायद इसलिए कि कलाश्निकोव की गोलियों के सामने एक पल और महफ़ूज़ रह सकें। किसी को गुमान तक न था कि कुछ ही पलों बाद रुस्तम मुबारक-आबादी—इसी ३० साला ट्रक ड्राइवर—का नाम उस रोज़ जान गंवाने वालों की फ़ेहरिस्त में दर्ज हो जाएगा। उस दिन रुस्तम पर सीधी गोली चलाई गई; एक जंगी गोली उसकी पसली को चीरती हुई उतर गई और उसी पल सामने से दागे गए छर्रे भी उसके जिस्म में धंस गए। मुंह से लहू का फ़व्वारा फूट रहा था और रुस्तम लहूलुहान होकर तड़प रहा था। उसे फ़ौरन अस्पताल पहुंचाया गया, मगर ज़ख़्म इतने गहरे थे कि इलाज की कोई कोशिश काम न आई और कुछ ही घं…
رستم مبارک آبادی · مبارکه اصفهان · راننده