अमर नायक अली बाक़ेरी; महवा की ख़ातिर

जान गंवाना अली बाक़ेरी 36 वर्ष में ईरान तेहरान नारमक

लेखक: कोहन

आख़िरी लम्हे तक उसमें जीने की अदम्य चाह बाकी थी, उस गोली के बावजूद जो उसके दिल और फेफड़े के दरमियान आकर धँस गई थी। उसके आख़िरी लफ़्ज़ ज़िंदगी के एक बेपनाह प्यार की गवाही दे रहे थे: महवा। «मुझे मरने मत देना, महवा की ख़ातिर…» लेकिन ३६ वर्षीय अली के पास उसे अपने सीने से लगाए रखने के लिए महज़ १५ महीनों की ही मोहलत थी। अंदरूनी रक्तस्राव ने उसकी सांसों की राह को इस कदर रोक दिया कि आगे जीने की बची-खुची ताक़त भी छिन गई, और ९ जनवरी (१९ देई) वह आख़िरी दिन साबित हुआ जब उसने अपनी बेटी को देखा था। तेहरान—वही शहर जहाँ वह पैदा हुआ था—ज़िंदा रहने की उसकी आख़िरी जद्दोजहद का गवाह बना। वह अपनी ३ बहनों का इकलौता भाई था और अपने पिता को पहले ही खो चुका था। बरसों पहले उसने तेहरान में अपनी स्कूली तालीम मुकम्मल की थी और फ़ुटबॉल के मैदानों में अपनी चमक बिखेरी थी; यहाँ तक कि उसकी तस्वीर खेल पत्रिका «ख़बर-ए वर्ज़ेशी» में भी छपी थी। कुछ वक़्त बाद उसने फ़ुटबॉल छोड़ दिया और 'एक्टिव' कारखाने में मुलाज़िम हो गया। मगर फ़ुटबॉल के लिए उसका जुनून कभी ख़त्म नहीं हुआ और मोटर साइकिल चलाने के शौक़ के साथ-साथ, ज़िंदगी में उसकी ख़ास जगह हमेशा क़ायम रही। अली को सफ़र से बेइंतहा मोहब्बत थी और उसके दोस्तों को उसके साथ सफ़र करने से। परिवार और दोस्तों के लिए अली के साथ सफ़र करना एक ऐसी याद थी, जिसे वक़्त की गर्द भले ही जगह और मंज…

علی باقری · تهران · نارمک · فوتبالیست

यहाँ पूरा पाठ पढ़ें

Narrata

Documented Truth by Independent Voices

A multilingual platform preserving personal narratives, eyewitness accounts, and untold stories.