अमर नायक मोहम्मद अमीनी दहाक़ानी; सबको कह दो कि मैं बेगुनाह हूँ
फांसी मोहम्मद अमीनी देहाक़ानी 37 वर्ष में ईरान डेकान
लेखक: रोशना
दहाक़ान के ज़िला मुख्यालय (फ़रमानदारी) की इमारत को आग लगाने का इल्ज़ाम उन्होंने मोहम्मद के सिर मढ़ दिया; वह आगज़नी जो शहज़ादे रेज़ा पहलवी के आह्वान के बाद, ८ और ९ जनवरी (१८ और १९ देय) के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई थी। लेकिन उस रात, जब सड़कें अवाम के ग़ुस्से से खौल रही थीं, मोहम्मद अपने घर पर अपने परिवार के साथ था, और कोई नहीं जानता था कि यह उन सबके एक साथ होने की आख़िरी रात है। मोहम्मद को अपनी सफ़ाई का कोई मौक़ा नहीं दिया गया। उसके परिवार ने उसे बचाने में कोई कसर न छोड़ी, मगर उनके लिए कोई दरवाज़ा न खुला। उन्होंने वकील का इंतज़ाम किया ताकि शायद सच की तह तक पहुँचा जा सके, लेकिन न तो वकील को मोहम्मद से मिलने की इजाज़त दी गई और न ही मुक़दमे की मुकम्मल फ़ाइल उसके हवाले की गई। परिवार ने बार-बार पैरवी की, सवाल पूछे और जवाब माँगे, मगर हर बार उनका सामना ख़ामोशी से हुआ। बंद दरवाज़ों के पीछे जो कुछ चल रहा था, वह परिवार से छुपाया जाता रहा और सच को जानने की हर कोशिश एक बंद गली में जाकर ख़त्म हो गई। यह मुक़दमा ९ जनवरी २०२६ (१९ देय १४०४) के शहरी निगरानी कैमरों की धुंधली तस्वीरों की बुनियाद पर गढ़ा गया था। तस्वीरों में एक मर्द दिखाई दे रहा था जो दहाक़ान की फ़रमानदारी और थाने पर पेट्रोल बम फेंक रहा था और भीड़ को उकसा रहा था। उन्होंने कहा कि वह मर्द मोहम्मद ही है; हालाँकि तस्वीर में कोई चेहरा नज़…
محمد امینی دهاقانی · دهاقان · کارگر · اعدام