अमर नायक रज़ा शरीफ़ी; अगर हम न जाएँ, तो फिर कौन जाए?
जान गंवाना रेज़ा शरीफ़ी 44 वर्ष में ईरान अराक
लेखक: साये
रज़ा शरीफ़ी, ४४ वर्ष के, शादीशुदा और दो बच्चों के पिता थे; एक ८ साल की बेटी और एक १६ साल का बेटा। ऐसे दो बच्चे, जिनके लिए पिता का साया सिर्फ़ उतने ही दिनों का रहा जितने दिन उनके पहचान-पत्र पर दर्ज थे। रज़ा अराक के फ़रमान चौक के एक ख़ुशमिज़ाज और नेकनाम व्यापारी थे। लोग और उनके ग्राहक उन्हें उनकी शराफ़त, दयालुता और अच्छे व्यवहार के लिए जानते थे। ज़िंदगी में तमाम दुश्वारियों को झेलने के बावजूद, वे ज़िंदगी को बहुत आसानी से लेते थे और हमेशा अपनों के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश करते रहते थे। ९ जनवरी (१९ दी) की रात, अराक शहर ने एक ऐसी रात का अनुभव किया जिसे बहुत से लोग कभी नहीं भूल पाएँगे। लोगों का एक हुजूम कंधे से कंधा मिलाकर, एक-दूसरे से गुथा हुआ खड़ा था। नारों की गूँज से सड़कें पट गई थीं; ख़ामेनेई का नाश हो, तानाशाह की मौत हो, शाह ज़िंदाबाद। सड़कों पर गूँजती लोगों की आवाज़ों ने पूरे शहर के वजूद को कँपा दिया था। सड़क के दूसरी तरफ़ से गोलियों की बौछार हो रही थी। स्नाइपर्स गोलियाँ चला रहे थे; मानो उस रात उनकी आँखों पर पट्टी बँधी हो और उन्हें दिख ही न रहा हो कि सामने कौन खड़ा है—छोटे-बड़े, औरत-मर्द, बूढ़े-जवान। हर गोली की आवाज़ के साथ, एक-एक करके लोग ज़मीन पर गिर रहे थे। उनमें से हर एक इंसान था, जिसकी अपनी एक ज़िंदगी थी, एक परिवार था और कई ऐसे सपने थे जो अभी पूरे नहीं हुए थे। उसी भीड़…
رضا شریفی · اراک · کاسب