अमर नायक हेसाम शोमाली; उम्मीद की लोरी
जान गंवाना हेसाम शोमाली 16 वर्ष में ईरान इस्फ़हान खोमैनी शहर
लेखक: नूरा
«मैंने दरवाज़ा खोला था। मैंने खुद अपने बच्चे को रुख़सत किया था।» ९ जनवरी (१९ देई) को माँ ने हेसाम के लिए दरवाज़ा खोला। जाने से पहले बस उससे रुकने की इल्तिजा की। कहा, मत जाओ। मगर हेसाम अपना फ़ैसला कर चुका था: «माँ, अगर मैं न जाऊँ तो फिर कौन जाएगा?» वह कहता था कि वह खुद अपने वतन के लिए कुछ करना चाहता है। हेसाम का घर इस्फ़हान के ख़ोमैनी-शहर में था; वही शहर जिसकी सड़कों को उसने ६ जनवरी (१६ देई) से नहीं छोड़ा था और ९ जनवरी (१९ देई) को वहीं उसने अपनी आख़िरी लड़ाई लड़ी। यह फ़ैसला उसी रात से शुरू नहीं हुआ था। हेसाम ६ जनवरी (१६ देई) से ही मैदान में डटा हुआ था। उसी रोज़ उसे छर्रे लगे थे और उसी ज़ख़्मी बदन के साथ उसने अपने दर्द को लड़कपन के एक मज़ाक़ के पीछे छिपा लिया था: «मैं आधा प्रतिशत जानबाज़ बन गया हूँ!» मगर वे छर्रे भी उसे बाहर जो कुछ घट रहा था, उससे जुदा न कर सके। उसकी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा अब भी स्कूल, घर और नाई की दुकान के बीच गुज़रता था। वह काम करता था ताकि परिवार के ख़र्च में हाथ बँटा सके, और ज़िंदगी से उसने अपना हिस्सा चुन लिया था; लेकिन जब बात सड़क पर उतरने की आई, तो ख़तरा भी उसने सिर्फ़ अपने हिस्से ही रखा। उसने किसी को साथ आने का न्योता नहीं दिया। उसने कहा था कि वह नहीं चाहता कि उसके साथ चलने के सबब किसी और को कोई तकलीफ़ पहुँचे और फिर उसका पछतावा ताउम्र उसके दिल पर बोझ बनकर…
حسام شومالی · خمینیشهر · اصفهان · دانشآموز