अमर नायक मोहम्मद रज़ा गोलमकानी; 'दुनिया बाबा', वह आवाज़ जो अब कभी सुनाई नहीं देगी
जान गंवाना मोहम्मद रेज़ा गोलमकानी 40 वर्ष में ईरान मशहद
लेखक: रोशना
बरसों से वज़न ज़मीन से उठते रहे हैं और चंद पलों के लिए उनका सारा भारीपन जिस्म की ताक़त के हवाले हो जाता है; लोहे के साथ कुछ लम्हों की कशमकश और फिर उसके ज़मीन पर आ गिरने की आवाज़। इस अमल को बार-बार दोहराने वाला यह शख्स मोहम्मद रज़ा गोलमकानी है। बरसों के कड़े अभ्यास ने उसे प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर पाँच चैंपियनशिप पदक दिलाए, और जो कुछ उसने इन सालों में सीखा, उसे मशहद के व्यायामशालाओं में अपने शागिर्दों को सौंपा। वज़न उसके लिए महज़ एक बोझ नहीं, बल्कि एक ज़बान है जिसे उसका जिस्म बखूबी पहचानता है: वह छड़ जो हाथों में पूरी तरह बैठ जाती है, वह खिंचाव जो मांसपेशियों में उतर जाता है, और वह पल जब लोहा एक मुख़्तसर सी ज़द्दोज़हद के बाद फिर से ज़मीन पर लौट आता है; मगर व्यायामशाला से बाहर, ज़िंदगी वज़नों के आदाद-ओ-शुमार से नहीं तौली जाती। घर पर उसकी पत्नी और दो मासूम बेटियाँ हैं, जहाँ ताक़त एक दूसरा ही रूप अख़्तियार कर लेती है: बेटी की बात सुनने के उसके सब्र में, उस भरोसे में जो वह उसके दिल में जगाता है, और उसकी ऐसी मौजूदगी में जिस पर बेझिझक भरोसा किया जा सके। मोहम्मद रज़ा एक हमसफ़र है और दो नन्हीं बेटियों का बाप। उसकी एक बेटी की लिखी बातों में, घर उन छोटी-छोटी चीज़ों से साकार होता है जिनका उसके खेल के रिकॉर्ड में कोई नामोनिशान नहीं: पिता के घर लौटने का इंतज़ार, दिनभर की बातों को उन्हें सुना…
محمدرضا گلمکانی · مشهد · بلوار امامت · دنیا بابا