अमर नायक मुस्तफ़ा क़ासमी
जान गंवाना मुस्तफ़ा क़ासेमी 24 वर्ष में ईरान मशहद मेराज चौक के आसपास
लेखक: नारीना
गिटार अब भी कमरे के एक कोने में रखा है। उसके तार कुछ ढीले पड़ चुके हैं और दस्ते पर धूल की एक बारीक परत जम गई है। जब शाहीन बैठकर बजाने लगता, तो लगता मानो दुनिया चंद मिनटों के लिए ठहरकर पीछे हट गई हो। जो हाथ बड़े सब्र और सलीक़े से खाल पर टैटू के नक़्श उकेरते थे, वही हाथ बाद में गिटार के तारों पर थिरकने लगते। अक्सर रातों को वह ततलू को सुनता और दूसरों के गीतों के टुकड़े ज़ेर-ए-लब गुनगुनाता: «बहस इस बात पर है कि कितनी क़समें...» या «एक बेआवाज़ आवाज़ के साथ, किसी बुलंद पहाड़ की तरह»। पहचान-पत्र में उसका नाम मुस्तफ़ा क़ासिमी दर्ज था, लेकिन वह ख़ुद हमेशा यही कहता: «मुझे शाहीन पुकारा करो।» जब उसके सिर में गोली लगी, तो वह महज़ २४ साल का था। वह डिप्लोमा धारक था, मशहद का रहने वाला और इसी शहर का बाशिंदा। वह एक टैटू आर्टिस्ट था और संगीत उसकी ज़िंदगी का एक गहरा हिस्सा। एक ज़िंदादिल और हँसमुख नौजवान, जो ईरान के हालात और बहाए गए बेगुनाहों के ख़ून से जब अपने दोस्तों को मायूस देखता, तो धीमे से सिर हिलाकर कहता: «सब ठीक हो जाएगा। देर-सवेर तो होती ही है...» उसकी ज़िंदगी आसान नहीं थी; घर का बहुत-सा ख़र्च उसी के कंधों पर था। वह घर का सहारा था, लेकिन उदासी कभी उसके चेहरे पर ठहरने नहीं पाती थी। वह हमेशा एक नई उमंग के साथ जुटा रहता और कहता कि सब दुरुस्त हो जाएगा। सोशल मीडिया पर उसकी छोड़ी हुई आख़िरी निशानी ब…
مصطفی قاسمی · مشهد · تتو آرتیست